Tuesday, 26 April 2016

जानें संन्यास और गृहस्थ क्या है श्रेष्ठ ?


एक राजा था । उसके राज्य में जब कभी कोई संन्यासी आते, तो उनसे वह सदैव एक प्रश्न पूछा करता था - ‘संसार का त्याग कर जो संन्यास ग्रहण करता है, वह श्रेष्ठ है, या संसार में रहकर जो गृहस्थ के समस्त कर्तव्यों को करता जाता है, वह श्रेष्ठ है ?’ अनेक विद्वान लोगों ने उसके इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयत्न किया । कुछ लोगों ने कहा कि संन्यासी श्रेष्ठ है । यह सुनकर राजा ने इसे सिद्ध करने को कहा । जब वे सिद्ध न कर सके तो राजा ने उन्हें विवाह करके गृहस्थ हो जाने की आज्ञा दी । कुछ और लोग आये और उन्होंने कहा ‘स्वधर्मपरायण गृहस्थ ही श्रेष्ठ है ।’ राजा ने उनसे भी उनकी बात के लिए प्रमाण मांगा । पर जब वे प्रमाण न दे सके, तो राजा ने उन्हें भी गृहस्थ हो जाने की आज्ञा दी ।
अंत में एक तरुण संन्यासी आये । राजा ने उनसे भी उसी प्रकार प्रश्न किया । संन्यासी ने कहा, ‘हे राजन्, अपने - अपने स्थान में दोनों ही श्रेष्ठ हैं, कोई भी कम नहीं है ।’ राजा ने उसका प्रमाण मांगा । संन्यासी ने उत्तर दिया, ‘हां, मैं इसे सिद्ध कर दूंगा, परंतु तुम्हें मेरे साथ आना होगा और कुछ दिन मेरे ही समान जीवन व्यतीत करना होगा । तभी मैं तुम्हें अपनी बात का प्रमाण दे सकूंगा ।’ राजा ने संन्यासी की बात स्वीकार कर ली और उनसे पीछे पीछे हो लिया । वह उन संन्यासी के साथ अपने राज्य की सीमा को पार कर अनेक देशों में से होता हुआ एक बड़े राज्य में आ पहुंचा । उस राज्य की राजधानी में एक बड़ा उत्सव मनाया जा रहा था । राजा और संन्यासी ने संगीत और नगाड़ों के शब्द सुने । लोग सड़कों पर सुसज्जित होकर कतारों में खड़े थे । उसी समय कोई एक विशेष घोषणा की जा रही थी । उपरोक्त राजा तथा संन्यासी भी यह सब देखने के लिए वहां खड़े हो गये । घोषणा करनेवाले ने चिल्लाकर कहा, ‘इस देश की राजकुमारी का स्वयंवर होनेवाला है ।’
राजकुमारियों का अपने लिए इस प्रकार पति चुनना भारत वर्ष में एक पुराना रिवाज था । अपने भावी पति के संबंध में प्रत्येक राजकुमारी के अलग अलग विचार होते थे । कोई अत्यंत रूपवान पति चाहती थी, कोई अत्यंत विद्वान, कोई अत्यंत धनवान, आदि आदि । अड़ोस पड़ोस के राज्यों के राजकुमार सुंदर से सुंदर ढंग से अपने को सजाकर राजकुमारी के सम्मुख उपस्थित होते थे । कभी कभी उन राजकुमारों के भी भाट होते थे, जो उनके गुणों का गान करते तथा यह दर्शाते थे कि उन्हीं का वरण किया जाएं । राजकुमारी को एक सजे हुए सिंहासन पर बिठाकर आलीशान ढंग से सभा के चारों ओर ले जाया जाता था । वह उन सब के सामने जाती तथा उनका गुणगान सुनती । यदि उसे कोई राजकुमार नापसंद होता, तो वह अपने वाहकों से कहती, ‘आगे बढ़ो’ और उसके पश्चात् उस नापसंद राजकुमार का कोई ख्याल तक न किया जाता था । यदि राजकुमारी किसी राजकुमार से प्रसन्न हो जाती, तो वह उसके गले में वरमाला डाल देती और वह राजकुमार उसका पति हो जाता था ।
जिस देश में यह राजा और संन्यासी आएं हुए थे, उस देश में इसी प्रकार का एक स्वयंवर हो रहा था । यह राजकुमारी संसार में अद्वितीय सुंदरी थी और उसका भावी पति ही उसके पिता के बाद उसके राज्य का उत्तराधिकारी होनेवाला था । इस राजकुमारी का विचार एक अत्यंत सुंदर पुरुष से विवाह करने का था, परंतु उसे योग्य व्यक्ति मिलता ही न था । कई बार उसके लिए स्वयंवर रचे गये, पर राजकुमारी को अपने मन का पति न मिला । इस बार का स्वयंवर बड़ा सुंदर था, अन्य सभी अवसरों की अपेक्षा इस बार अधिक लोग आये थे ।

इतने में वहां तरुण संन्यासी आ पहुंचा । वह इतना सुंदर था कि मानो सूर्यदेव ही आकाश छोड़कर स्वयं पृथ्वी पर उतर आयें हों । वह आकर सभा के एक ओर खड़ा हो गया और जो कुछ हो रहा था, उसे देखने लगा । राजकुमारी का सिंहासन उसके समीप आया और ज्यों ही उसने उस सुंदर संन्यासी को देखा, त्यों ही वह रुक गयी और उसके गले में वरमाला डाल दी । तरुण संन्यासी ने माला को रोक लिया और यह कहते हुए, ‘छि: छि: यह क्या है ?’ उसे फेंक दिया । उसने कहा, ‘मैं संन्यासी हूं, मुझे विवाह से क्या प्रयोजन ?’
इधर राजकुमारी इस युवा पर इतनी मोहित हो गयी कि उसने कह दिया, मैं इसी मनुष्य से विवाह करूंगी, नहीं तो प्राण त्याग दूंगी । और राजकुमारी संन्यासी के पीछे पीछे उसे लौटा लाने के लिए चल पड़ी । इसी अवसर पर अपने पहले संन्यासी ने, जो राजा को यहां लाएं थे, राजा से कहा, ‘राजन् चलिए, इन दोनों के पीछे पीछे हम लोग भी चलें ।’ अंत में एक जंगल में घुस गया । उसके पीछे राजकुमारी थी, और उन दोनों के पीछे ये दोनों ।
तरुण संन्यासी उस वन से भलीभांति परिचित था तथा वहां के सारे जटिल रास्तों का उसे ज्ञान था । वह एकदम एक रास्ते में घुस गया और अदृश्य हो गया । उसे काफी देर ढूंढने के बाद अंत में वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गयी और रोने लगी, क्योंकि उसे बाहर निकलने का मार्ग नहीं मालूम था । इतने में यह राजा और संन्यासी उसके पास आये और उससे कहा, ‘बेटी, रोओ मत, हम तुम्हें इस जंगल के बाहर निकाल ले चलेंगे, परंतु अभी बहुत अंधेरा हो गया है, जिससे रास्ता ढूंढ़ना सहज नहीं । यहीं एक बड़ा पेड़ है, आओ, इसी के नीचे हम सब विश्राम करें और सबेरा होते ही हम तुम्हें मार्ग बता देंगे ।’
अब, उस पेड़ की एक डाली पर एक छोटी चिड़िया, उसकी स्त्री तथा उसके तीन बच्चे रहते थे । उस चिड़िया ने पेड़ के नीचे इन तीन लोगों को देखा और अपनी स्त्री से कहा, ‘देखो, हमारे यहां ये लोग अतिथि हैं, जाड़े का मौसम है, हम लोग क्या करें ? हमारे पास आग तो है नहीं ।’ यह कहकर वह उड़ गया और एक जलती हुई लकड़ी का टुकड़ा अपनी चोंच में दबा लाया और उसे अतिथियों के सामने गिरा दिया । उन्होंने उसमें लकड़ी लगा - लगाकर आग तैयार कर ली, परंतु चिड़िया को फिर भी संतोष न हुआ । उसने अपनी स्त्री से फिर कहा, ‘बताओ, अब हमें क्या करना चाहिए ? ये लोग भूखे हैं, और इन्हें खिलाने के लिए हमारे पास कुछ भी नहीं है । हम लोग गृहस्थ है और हमारा धर्म है कि जो कोई हमारे घर आये, उसे हम भोजन करायें । जो कुछ मेरी शक्ति में है, मुझे अवश्य करना चाहिए, मैं उन्हें अपना यह शरीर ही दे दूंगा ।’ ऐसा कहकर वह आग में कूद पड़ा और भुन गया । अतिथियों ने उसे आग में गिरते देखा, उसे बचाने का यत्न भी किया, परंतु बचा न सके । उस चिड़िया की स्त्री ने अपने पति का सुकृत देखा और अपने मन में कहा, ‘ये तो तीन लोग हैं, उनके भोजन के लिए केवल एक ही चिड़िया पर्याप्त नहीं । पत्नी के रूप में मेरा यह कर्तव्य है कि अपने पति के परिश्रमों को मैं व्यर्थ न जाने दूं । वे मेरा भी शरीर ले लें ।’ और ऐसा कहकर वह भी आग में गिर गयी और भुन गयी ।
तब संन्यासी ने राजा से कहा, ‘देखो राजन्, तुम्हें अब ज्ञात हो गया है कि अपने अपने स्थान में सब बड़े हैं । यदि तुम संसार में रहना चाहते हो, तो इन चिड़ियों के समान रहो, दूसरों के लिए अपना जीवन दे देने को सदैव तत्पर रहो । और यदि तुम संसार छोड़ना चाहते हो, तो उस युवा संन्यासी के समान हो, जिसके लिए वह परम सुंदरी स्त्री और एक राज्य भी तृणवत था । यदि गृहस्थ होना चाहते हो तो दूसरों के हित के लिए अपना जीवन अर्पित कर देने के लिए तैयार रहो । और यदि तुम्हें संन्यास जीवन की इच्छा है तो सौंदर्य, धन तथा अधिकार की ओर आंख तक न उठाओ । अपने - अपने स्थान में सब श्रेष्ठ हैं, परंतु एक का कर्तव्य दूसरे का कर्तव्य नहीं हो सकता ।’

Saturday, 9 April 2016

प्रभु श्रीराम का प्रलयंकारी धनुष "कोदंड":-


भगवान राम के धनुष का नाम कोदंड था इसीलिए प्रभु श्रीराम को कोदंड कहा जाता था। 'कोदंड' का अर्थ होता है बांस से निर्मित। कोदंड एक चमत्कारिक धनुष था जिसे हर कोई धारण नहीं कर सकता था। कोदंड नाम से भिलाई में एक राम मंदिर भी है जिसे 'कोदंड रामालयम मंदिर' कहा जाता है। भगवान श्रीराम दंडकारण्य में 10 वर्ष तक भील और आदिवासियों के बीच रहे थे।
एक बार समुद्र पार करने का जब कोई मार्ग नहीं समझ में आया तो भगवान श्रीराम ने समुद्र को अपने तीर से सुखाने की सोची और उन्होंने तरकश से अपना तीर निकाला ही था और प्रत्यंचा पर चढ़ाया ही था कि समुद्र के देवता प्रकट हो गए और उनसे प्रार्थना करने लगे थे। भगवान श्रीराम को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाता है। हालांकि उन्होंने अपने धनुष और बाण का उपयोग बहुत ‍मुश्किल वक्त में ही किया।
देखि राम रिपु दल चलि आवा। बिहसी कठिन कोदण्ड चढ़ावा।।
अर्थात शत्रुओं की सेना को निकट आते देखकर श्रीरामचंद्रजी ने हंसकर कठिन धनुष कोदंड को चढ़ाया।
कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।
मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥
कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै।
चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै॥
भावार्थ:-कठिन धनुष चढ़ाकर सिर पर जटा का जू़ड़ा बाँधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे मरकतमणि (पन्ने) के पर्वत पर करोड़ों बिजलियों से दो साँप लड़ रहे हों। कमर में तरकस कसकर, विशाल भुजाओं में धनुष लेकर और बाण सुधारकर प्रभु श्री रामचंद्रजी राक्षसों की ओर देख रहे हैं। मानों मतवाले हाथियों के समूह को (आता) देखकर सिंह (उनकी ओर) ताक रहा हो।
प्रभु कीन्हि धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा।
भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा॥
प्रभु श्री रामजी ने पहले धनुष का बड़ा कठोर, घोर और भयानक टंकार किया, जिसे सुनकर राक्षस बहरे और व्याकुल हो गए। उस समय उन्हें कुछ भी होश न रहा।
प्राचीन समय में सैन्य विज्ञान का नाम ही धनुर्वेद था, जिससे सिद्ध होता है कि उन दिनों युद्ध में धनुष बाण का कितना महत्व था।
नीतिप्रकाशिका में मुक्तवर्ग के अंतर्गत 12 प्रकार के शस्त्रों का वर्णन है, जिनमें धनुष का स्थान प्रमुख है।

चक्रिक भील

चक्रिक भील

अर्थात् ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और जो अन्य अन्त्यज लोग हैं, वे भी हरिभक्तिद्वारा भगवान की शरण होने से कृतार्थ हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है । यदि ब्राह्मण भी भगवान के विमुख हो तो उसे चाण्डाल से अधिक समझना चाहिए और यदि चाण्डाल भी भगवान का भक्त हो तो उसे भी ब्राह्मण से अधिक समझना चाहिये ।’

द्वापरयु में चक्रिक नामक एक भील वन में रहता था । भील होने पर भी उसके आचरण बहुत ही उत्तम थे । वह मीठा बोलने वाला, क्रोध जीतनेवाला, अहिंसापरायण, दयालु, दंभहीन और माता - पिता की सेवा करनेवाला था । यद्यपि उसने कभी शास्त्रों का श्रवण नहीं किया था तथापि उसके हृदय में भगवान की भक्ति का आविर्भाव हो गया था । सदा हरि, केशव, वासुदेव और जनार्दन आदि नामों का स्मरम किया करता था । वन में एक भगवान हरि की मूर्ति थी । वह भील वन में जब कोई सुंदर फल देखता तो पहले उसे मुंह में लेकर चखता, फल मीठा न होता तो उसे स्वयं खा लेता और यदि बहुत मधुर और स्वादिष्ट होता तो उसे मुंह से निकालकर भक्तिपूर्वक भगवान के अर्पण करता । वह प्रतिदिन इस तरह पहले चखकर स्वादिष्ट फल का भगवान के श्रद्धा से भोग लगाया करता । उसको यह पता नहीं था कि जूठा फल भगवान के भोग नहीं लगाना चाहिए । अपनी जाति के संस्कार के अनुसार ही वह सरलता से ऐसा आचरण किया करता ।

एक दिन वन में घूमते हुए भील कुमार चक्रिक ने एक पियाल वृक्ष का एक पका हुआ फल देखा । उसने फल तोड़कर स्वाद जानने के लिए उसको जीभपर रखा, फल बहुत ही स्वादिष्ट था, परंतु जीभ पर रखते ही वह गले में उतर गया । चक्रिक को बड़ा विषाद हुआ, भगवान के भोग लगाने लायक अत्यंत स्वादिष्ट फल खाने का वह अपना अधिकार नहीं समझता था । ‘सबसे अच्छी चीज ही भगवान को अर्पण करनी चाहिए’ उसकी सरल बुद्धि में यहीं सत्य समाया हुआ था । उसने दाहिने हाथ से अपना गला दबा लिया कि जिससे फल पेट में चला जाएं । वह चिंता करने लगा कि ‘अहो ! आज मैं भगवान को मीठा फल न खिला सका, मेरे समान पापी और कौन होगा ? ’ मुंह में अंगुली डालकर उसने वमन किया तब भी गले में अटका हुआ फल नहीं निकला । चक्रिक श्रीहरि का एकांत सरल भक्त था, उसने भगवान की मूर्ति के समीप आकर कुल्हाड़ी से अपना गला एक तरफ से काटकर फल निकाला और भगवान के अर्पण किया । गले से खून बह रहा था । पीड़ा के मारे व्याकुल हो चक्रिक बेहोश होकर गिर पड़ा । कृपामय भगवान उस सरल हृदय शुद्धांत:करण प्रेमी भक्त की महती भक्ति देखकर प्रसन्न हो गये और चतुर्भुजरूप से साक्षात् प्रकट होकर कहने लगे -

इस चक्रिक के समान मेरा भक्त कोई नहीं, क्योंकि इसने अपना कण्ठ काटकर मुझे फल प्रदान किया है -

‘यद् द्त्त्वानृण्यमाप्नोति तथा वस्तु किमस्ति मे ।’

‘मेरे पास ऐसी क्या वस्तु है जिसे देकर मैं इससे उऋण हो सकूं ? इस भील पुत्र को धन्य है ! मैं ब्रहत्व, शिवत्व या विष्णुत्व देकर भी इससे उऋण नहीं हो सकता ।’

इतना कहकर भगवान ने उसके मस्तक पर हाथ रखा । कोमल करकमल का स्पर्श होते ही उसकी सारी व्यथा दूर हो गयी और वह क्षण उठ बैठा । भगवान उसे उठाकर अपने पीतांबर से जैसे पिता अपने प्यारे पुत्र के अंग की धूल झाड़ता है, उसके अंग की धूल झाड़ने लगे । चक्रिक ने भगवान को साक्षात् अपने सम्मुख देखकर हर्ष से मधुर वाक्यों से उनकी स्तुति की -

‘हे गोविंद, हे केशव, हे हरि, हे जगदीश, हे विष्णु ! यद्यपि मैं आपकी प्रार्थना करने योग्य वचन नहीं जानता तथापि मेरी रसना आपकी स्तुति करना चाहती है । हे स्वामी ! कृपाकर मेरे इस महान दोष का नाश कीजिए । हे चराचरपति, चक्रधारी ! जिस पूजा से प्रसन्न होकर आपने मुझपर कृपा की है, आपकी उस पूजा को छोड़कर संसार में जो लोग दूसरे की पूजा करते हैं, वे महामूर्ख हैं ।’

भगवान उसकी स्तुति से बड़े संतुष्ट हुए और उसे वर मांगने को कहा । सरल भक्त बोला -

हे परब्रह्म ! हे परमधाम !! हे कृपामय परमात्मन !! जब मैंने साक्षात् आपके दर्शन प्राप्त कर लिये हैं तो मुझे और वर की क्या आवश्यकता है ? परंतु हे लक्ष्मीनारायण ! आप वर देना ही चाहते हैं तो कृपाकर यहीं वर दीजिए कि मेरा चित्त आप में ही अचलरूप से लगा रहे ।

भक्तों को इस वर के सिवा और कौन सा वर चाहिए ? भगवान परम प्रसन्न हो अपनी चारों विशाल भुजाओं से चक्रिक का आलिंगन करके, भक्ति का वर दे, वहां से अंतर्धान हो गये । तदंतर चक्रिक द्वार का चला गया और वहां भगवत्कृपा से ज्ञान लाभकर अंत में देवदुर्लभ मोक्ष पद को प्राप्त हो गया । जो कोई भी भगवान की सरल, शुद्ध भक्ति करता है वहीं उन्हें पाता है -
जो मनुष्य दृढ़ भक्ति के द्वारा इंद्रादि देवपूजित वासुदेव भगवान के चरणकमल युगल की पूजा करता है, वहीं मुक्ति प्राप्त कर सकता है ।

सौरधर्म का वर्णन



राजा शतानीक ने पूछा - मुने ! भगवान सूर्य का माहात्म्य कीर्तिवर्धक और सभी पापों का नाशक है । मैंने भगवान सूर्यनारायण के समान लोक में किसी अन्य देवता को नहीं देखा । जो बरण - पोषम और संहार भी करनेवाले हैं वे भगवान सूर्य किस प्रकार प्रसन्न होते हैं, उस धर्म को आप अच्छी तरह जानते हैं । मैंने वैष्मव, शैव, पौराणिक आदि धर्मों का श्रवण किया है । अब मैं सौरधर्म को जानना चाहता हूं । इसे आप मुझे बताएं ।

सुमंतु मुनि बोले - राजन् ! अब आप सौरधर्म के विषय में सुनें । यह सौरधर्म सभी धर्मों में श्रेष्ठ और उत्तम है । किसी समय स्वयं भगवान सूर्य ने अपने सारथि अरुण से इसे कहा था । सौरधर्म अंधकार रूपी दोष को दूरकर प्राणियों को प्रकाशित करता है और यह संसार के लिये महान कल्याणकारी है । जो व्यक्ति शांतिचित्त होकर सूर्य की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह सुख और धन धान्य से परिपूर्ण हो जाता है । प्रात: मध्याह्न और सायं त्रिकाल अथवा एक ही समय सूर्य की उपासना अवश्य करनी चाहिए । जो व्यक्ति सूर्यनारायण का भक्तिपूर्वक अर्चन, पूजन और स्मरण करता है, वह सात जन्मों में किये गये सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है । जो भगवान सूर्य की सदा स्तुति, प्रार्थना और आराधना करते हैं, वे प्राकृत मनुष्य न होकर देवस्वरूप ही हैं । षोडशांग पूजन विधि को स्वयं सूर्यनारायण ने कहा है, वह इस प्रकार है -

प्रात: स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिए । जप, हवन, पूजन, अर्चनादि कर सूर्य को प्रणाम करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मण, गाय, पीपल आदि की पूजा करनी चाहिए । भक्तिपूर्वक इतिहास पुराण का श्रवण और ब्राह्मणों को वेदाभ्यास करना चाहिए । सबसे प्रेम करना चाहिए । स्वयं पूजन कर लोगों को पुराणादि ग्रंथों की व्याख्या सुनानी चाहिए । मेरा नित्य प्रति स्मरण करना चाहिए । इस प्रकार के उपचारों से जो अर्चन पूजन विधि बतायी गयी है, वह सभी प्रकार के लोगों के लिए उत्तम है । जो कोई इस प्रकार से भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करता है, वहीं मुनि, श्रीमान्, पण्डित और अच्छे कुल में उत्पन्न है । जो कोई पत्र, पुष्प, फल, जल आदि जो भी उपलब्ध हो उससे मेरी पूजा करता है उसके लिये न मैं अदृश्य हूं और न वह मेरे लिये अदृश्य है ।

मुझे जो व्यक्ति जिस भावना से देखता है, मैं भी उसे उसी रूप में दिखायी पड़ता हूं । जहां मैं स्थित हूं, वहीं मेरा भक्त भी स्थित होता है । जो मुझ सर्वव्यापी को सर्वत्र और संपूर्ण प्राणियों में स्थित देखता है, उसके लिये मैं उसके हृदय में स्थित हूं और वह मेरे हृदय में स्थित है । सूर्य की पूजा करने वाला व्यक्ति बड़े - बड़े राजाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है । जो व्यक्ति मन से मेरा निरंतर ध्यान करता रहता है, उसकी चिंता मुझे बराबर बनी रहती है कि कहीं उसे कोई दु:ख न होने पायें । मेरा भक्त मुझको अत्यंत प्रिय है । मुझमें अनन्य निष्ठा ही सब धर्मों का सार है ।

आदिगुरु श्रीकृष्ण



वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् ।
देवकीपरमानंद कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।।

यह संसार एक बहुत बड़ी पाठशाला है । इसमें अगणित जीव शिक्षा ग्रहण करने के लिये आते हैं, और यथाधिकार निर्दिष्ट काल तक शिक्षा - लाभ कर चले जाते हैं, और फिर कुछ विश्राम के पश्चात् पुन: नये वेशभूषा के साथ इसमें आकर प्रवेश करते हैं । कहने का आशय यह है कि जीवन का एक जन्म उसके लिये इस पाठशाला का एक अध्ययन दिवस है । जब तक कोई यहां की पूरी पढ़ाई समाप्त न कर ले तब तक उससे मुक्ति दूर ही रहती है - उसे बार बार जन्म मरण के बंधन में पड़ना ही पड़ता है ।

यह पाठशाला अनादिकाल से चली आ रही है । अत्यंत आदर्श पाठशाला है, अति विचित्र है और अति प्राचीन होने पर भी नित्य नवीन है । शिक्षा का ढंग भी ऐसा अद्भुत है कि विद्यार्थियों को यह पता भी कठिनता से लग पाता है कि उन्हें शिक्षा मिल रही है । स्वल्पबोध छात्रों को तो स्नेहमयी प्रकृतिजननी अपनी गोद में लेकर शिक्षा देती हैं, और प्रौढ़ विद्यार्थियों को स्वयं परमपिता जगद्गुरु की वाणी सुनने का सौभाग्य प्राप्त होता है ।

यह वाणी जिस मूर्ति के द्वारा सुनी जाती है उसे गुरु कहते हैं, क्योंकि वह शिष्य के अज्ञान को नाश करती है । ‘गु’ का अर्थ है अंधकार और ‘रु’ का निरोध को कहते हैं अर्थात् जो अंधकार का नास करता है वह गुरु कहलाता है । पर वस्तुत: एक मनुष्य दूसरे का गुरु नहीं हो सकता । सबका गुरु तो वहीं एक परमात्मा है, वहीं किसी शरीर के द्वारा दूसरे को उपदेश देता है । उसी निमित्त कारण को हम लोग गुरु मानकर उसका आदर करते हैं, और वस्तुत: वही हमारे लिये परमेश्वर की मूर्ति है ।

पाठशाला के समस्त पाठ्य ग्रंथ वेदशास्त्रादि में इन्हीं दो (प्रवृत्ति और निवृत्ति) धर्मों का निरूपण है । प्रवृत्ति लक्षण धर्म समग्र इष्ट भोगों का देनेवाला है और निवृत्ति लक्षण धर्म मोक्षदाता है । केवल प्रवृत्ति लक्षण ही दोनों फलों को दे सकता है यदि पूर्ण निष्कामभाव से कर्म किया जाएं, क्योंकि निष्कामभाव के साथ कर्म करने से चित्त शुद्धि होती है और चित्त शुद्धि से निवृत्ति लक्षण धर्म की भी योग्यता आ जाती है जिससे मुक्ति होती है । इस प्रकार यह प्रवृत्ति धर्म भी निष्कामभावपूर्वक करने से परंपरा से मोक्ष का कारण है । ऐसी बात न होती, यदि यह भी मोक्ष तक पहुंचानेवाला न होता तो इसे पाठ्य ग्रंथ में स्थान ही क्यों मिलता ? क्योंकि जीव का परम पुरुषार्थ मोक्ष प्राप्त करना है ।

आदिगुरु नारायण भगवान ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से सदा संपन्न हैं, सर्व भूतों के ईश्वर हैं, नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वभाव हैं । उनका जन्म तो होता नहीं, वे नित्य अव्यय हैं, अत: अपनी त्रिगुणात्मिका वैष्णवी माया मीलप्रकृति को वश में करके उसी माया द्वारा जन्म लिये हुए की भांति प्रतीत हुए और शरीर की तरह अनुग्रह करते हुए दिखायी दिये ।इस प्रकार वेद और ब्राह्मणत्व की रक्षा के लिये आदिकर्ता नारायण ने देव की और वसुदेव के घर में अवतार घारण किया । उस समय पाठशाला का एक अति गुणी छात्र अर्जुन जो सखारूप से सरकार की उपासना करता था, क्षात्रर्मानुसार युद्ध में स्वयं प्रवृत्त होकर भी शोकऔर मोह से अभिभूत हो अपने धर्म से हटने लगा । इस पर जगद्गुरु श्रीकृष्ण ने उस योग्य पात्र को प्रवृत्ति निवृत्ति लक्षण धर्मों के सार गीताज्ञान का उपदेश दिया, जिसे पीछे से बगवान वेदव्यास ने 700 श्लोकों में व्यक्त किया । यहीं संक्षेप में जगद्गुरु श्रीकृष्ण का दिव्य जन्म कर्म है ।

यह गीता जगद्गुरु श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने श्रीमुख से कही है, इसी से इसकी इतनी महिमा है । इस पाठशाला में आने वाले अधिसंख्यक विद्यार्थियों को उस जगद्गुरु के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ, इसके लिये खेद करने की आवश्यकता नहीं है । वह रूप तो कालविशेष और प्रयोजनविशेष के लिये ही प्रकट हुआ था । अत: कार्य पूरा होने पर अंतर्धान हो गया । पर यह नित्यरूप गीताज्ञान तो सदा के लिये इस पाठशाला में बना ही हुआ है, इसलिये जिसे यहां आकर जगद्गुरु श्रीकृष्ण के इस ज्ञानमय रूप का दर्शन नहीं हुआ उसका जन्म निष्फल हुआ, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है, और जिसने इस ज्ञान को हृदय में स्थान दिया उसके हृदय में जगद्गुरु श्रीकृष्ण विराजमान हैं, इसमें भी कोई संदेह नहीं 

Tuesday, 5 April 2016

कर्तव्यपरायणता का अद्भुत आदर्श


प्राचीन काल में सर्वसमृद्धिपूर्ण वर्धमान नगर में रूपसेन नाम का एक धर्मात्मा राजा था। एक दिन उसके दरबार में वीरवर नाम का एक गुणी व्यक्ति अपनी पत्नी, कन्या एवं पुत्र के साथ वृत्ति के लिए उपस्थित हुआ। राजा ने उसकी विनयपूर्ण बातों को सुनकर प्रतिदिन एक सहस्त्र स्वर्णमुद्रा का वेतन नियत कर सिंहद्वार के रक्षक के रूप में उसकी नियुक्ति कर ली। दूसरे दिन राजा ने अपने गुप्तचरों से जब पता लगाया तो ज्ञात हुआ कि वह अपना अधिकांश द्रव्य यज्ञ, तीर्थ, शिव, विष्णु के मंदिरों में आराधनादि-कार्यों तथा साधु, ब्राह्मण एवं अनाथों में वितरित कर अत्यल्प शेष से अपने परिजनों का पालन करता है। इससे राजा ने प्रसन्न होकर उसकी नियुक्ति को पूर्णरूप से स्थायी कर दिया।
एक दिन आधी रात में जब मूसलाधार वृष्टि, बादलों की गरज, विद्युत एवं झंझावात से रात्रि की विभीषिका सीमा स्पर्श कर रही थी, श्मशान से किसी नारी के करुण-क्रंदन की ध्वनि राजा के कानों में पड़ी। राजा ने सिंहद्वार पर उपस्थित वीरवर से इस रुदन-ध्वनि का पता लगाने के लिए कहा। जब वीरवर तलवार लेकर चला तब राजा भी उसके भय की आशंका तथा सहयोगार्थ एक तलवार लेकर गुप्तरूप से उसके पीछे लग गया। वीरवर ने श्मशान पहुंचकर एक स्त्री को वहां रोते देखा और उससे जब इसका कारण पूछा, तब उसने कहा कि ‘मुझे इस राज्य की लक्ष्मी अथवा राष्ट्रलक्ष्मी समझो। इसी मास के अंत में राजा रूपसेन की मृत्यु जो जाने पर में अनाथ होकर कहां जाऊंगी, इसीलिए रो रही हूं।’ वीरवर ने राजा की दीर्घायु के लिए जब उससे उपाय पूछा, तब उसने वीरवर के पुत्र की चण्डिका के सामने बलि देने से राजा के शतायु जोने की बात कही। फिर क्या था? वीरवर उलटे पांव घर लौटकर पत्नी, पुत्र आदि को जगाकर और उनकी सम्मति लेकर उनके साथ चण्डिका-मंदिर में पहुंचा। राजा भी गुप्तरूप से पीछे-पीछे सर्वत्र जाता रहा। वीरवर ने देवी की प्रार्थना कर राजा की आयु बढ़ाने के लिए अपने पुत्र की बलि चढ़ा दी। इसे देखते ही उसकी बहन का दु:ख से हृदयविस्फोट हो गया। फिर उसकी माता भी चल बसी। वीरवर इन तीनों का दाहकर स्वयं भी राजा की आयु वृद्धि के लिए बलि चढ़ गया।
राजा छिपकर यह सब देख रहा था। उसने देवी की प्रार्थना की। अपने जीवन को व्यर्थ बताते हुए और अपना सिर काटने के लिए उसने ज्यों ही तलवार खींची त्यों ही देवी ने प्रकट होकर उसका हाथ पकड़ लिया और वर मांगने के लिए कहा। राजा ने देवी से परिजनों-सहित वीरवर को जिलाने की प्रार्थना की। फलत: देवी ने सबको जिला दिया और राजा चुपके से वहां से चलकर अपनी अट्टालिका में जाकर लेट गया। इधर वीरवर भी चकित होता हुआ तथा देवी की कृपा मानता हुआ अपने पुनर्जीवित परिवार को घर पर छोड़कर राजप्रासाद के सिंहद्वार पर खड़ा हो गया। जब राजा ने इसके वहां उपस्थिति के लक्षणों से परिचित होकर उसे बुलाकर अज्ञात नारी के रुदन का कारण पूछा, तब वीरवर ने कहा ‘राजन! वह कोई चुड़ैल थी और मुझे देखते ही अदृश्य हो गई, चिंता की कोई बात नहीं।’
इस पर राजा ने मन-ही-मन उसकी धीरता तथा स्वामिभक्ति की प्रशंसा की और प्रात:काल सारी बात को अपने सभासदों से बतलाकर वीरवर को पुत्रसहित कर्नाट एवं लाटदेश (महाराष्ट्र-गुजरात) - का अधिपति बना दिया। उन्होंने वीरवर को अपने तुल्य ही समृद्धिशाली बनाकर अपनी मैत्री की दृढ़ता का निश्चय किया।
यह कथा परोपकार, कर्तव्यपरायणता, दीन एवं अनाथ की सेवा, स्वामिभक्ति एवं परस्पर प्राणरक्षार्थ आत्मोत्सर्ग की भावना की तीव्र प्रेरणा प्रदान करती है

गरुड, सुदर्शनचक्र और श्रीकृष्ण की रानियों का गर्व-भंग



एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने गरुड को यक्षराज कुबेर के सरोवर से सौगंधिक कमल लाने का आदेश दिया। गरुड को यह अहंकार तो था ही कि मेरे समान बलवान तथा तीव्रगामी प्राणी इस त्रिलोकी में दूसरा नहीं है। वे अपने पंखों से हवा को चीरते तथा दिशाओं को प्रतिध्वनित करते हुए गंधमादन पहुंचे और पुष्पचयन करने लगे। महावीर हनुमानजी का वहीं आवास था। इस गरुड के इस अनाचार को देखकर उनसे बोले - ‘तुम किसके लिए यह फूल के जा रहे हो और कुबेर की आज्ञा के बिना ही पुष्पों का क्यों विध्वंस कर रहे हो?’

गरुड ने उत्तर दिया - ‘हम भगवान श्रीकृष्ण के लिए इन पुष्पों को ले जा रहे हैं। भगवान के लिए हमें किसी की अनुमति आवश्यक नहीं दीखती।’ गरुड की इस बात से हनुमानजी कुछ क्रुद्ध हो गए और उन्हें पकड़कर अपनी कांख में दबाकर आकाशमार्ग से द्वारका की ओर उड़ चले। उनकी भीषण ध्वनि से सारे द्वारकावासी संत्रस्त हो गए। सुदर्शन चक्र हनुमानजी की गति को रोकने के लिए उनके सामने जा पहुंचा। हनुमानजी ने झट उसे दूसरी कांख में दाब लिया। भगवान श्रीकृष्ण ने तो यह सब लीला रची ही थी। उन्होंने अपने पार्श्व में स्थित रानियों से कहा - ‘देखो, हनुमान क्रुद्ध होकर आ रहे हैं। यदि यहां उन्हें उस समय सीता-राम के दर्शन न हुए तो वे द्वारका को समुद्र में डुबो देंगे। अतएव तुममें से तुरंत कोई सीता का रूप बना लो, मैं तो देखो यह राम बना।’ इतना कहकर वे श्रीराम के स्वरूप में परिणत होकर बैठ गए। अब जानकीजी का रूप बनाने को हुआ, तब कोई भी न बना सकीं। अंत में भगवान ने श्रीराधाजी का स्मरण किया। वे आईं और झट श्रीजानकीजी का स्वरूप बन गईं।

इसी बीच हनुमानजी वहां उपस्थित हुए। वहां वे अपने इष्टदेव श्रीसीतारामजी को देखकर उनके चरणों में गिर गए। इस समय भी वे गरुड और सुदर्शन चक्र को बड़ी सावधानी से अपने दोनों बगलों में दबाए हुए थे। भगवान श्रीकृष्ण ने (राम-वेश में) उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा - ‘वत्स! तुम्हारी कांखों में यह क्या दिखलाई पड़ रहा है?’ हनुमानजी ने उत्तर दिया - ‘कुछ नहीं सरकार! यह तो एक दुबला सा क्षुदे पक्षी निर्जन स्थान में मेरे श्रीरामभजन में बाधा डाल रहा था, इसी कारण मैंने इसे पकड़ लिया। दूसरा यह चक्र-सा एक खिलौना है, यह मेरे साथ टकरा रहा था, अतएव इसे भी दाब लिया है। आपको यदि पुष्पों की ही आवश्यकता थी तो मुझे क्यों नहीं स्मरण किया गया? यह बेचारा पखेरू महाबलौ शिवभक्त यक्षों के सरोवर से बलपूर्वक पुष्प लाने में कैसे समर्थ हो सकता है?’

भगवान ने कहा - ‘अस्तु! इन बेचारों को छोड़ दो। मैं तुम्हारे ऊपर अत्यंत प्रसन्न हूं, अब तुम जाओ, अपने स्थान पर स्वच्छंदतापूर्वक भजन करो।’

भगवान की आज्ञा पाते ही हनुमानजी ने सुदर्शन चक्र और गरुड को छोड़ दिया तथा उन्हें पुन: प्रणाम करके ‘जय श्रीराम’ कहते हुए गंधमादन की ओर चल दिए। गरुड को गति का, सुदर्शन को शक्ति का और पट्टमहिषियों को सौंदर्य का जो बड़ा गर्व था, वह एकदम चूर्ण हो गया।