Tuesday, 16 August 2016

वेदों में गायत्री का गौरव


तस्मात् अज्ञान सर्व हुतः ऋचा सामानि अज्ञिरे ।।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् यजुस्तस्समाद जायत ॥ (यजुः 31- 7)
अर्थात् उस यज्ञ का रूप परम ब्रह्म परमात्मा द्वारा चारों वेद ऋक्, यज्, साम, अथर्व सृष्टि के आदि में प्रादुर्भूत हुए ।।
• वेदों में गायत्री का गौरव
तस्मात् अज्ञान सर्व हुतः ऋचा सामानि अज्ञिरे ।।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् यजुस्तस्समाद जायत ॥ (यजुः 31- 7)
अर्थात् उस यज्ञ का रूप परम ब्रह्म परमात्मा द्वारा चारों वेद ऋक्, यज्, साम, अथर्व सृष्टि के आदि में प्रादुर्भूत हुए ।।
(1) ऋग्वेद– में ज्ञान की बातें हैं अतः इसे ज्ञान काण्ड कहते हैं ।। इसमें कुल 10 मण्डल हैं ।। 85 अनुवादक हैं ।। 10522 मंत्र हैं ।इसके दो ब्राह्मण ग्रन्थ हैं- ऐतरेय और और कौषीतकी तथा इसकी 28 शाखाएँ हैं और इसका ‘आयुर्वेद’ उपवेद है ।। गायत्री गुरुमंत्र- ऋग्वेद मण्डल 3 सूक्त 62 मंत्र 10 में आया ।।
(2) यजुर्वेद– में यज्ञ सम्बन्धी विशेष बातें हैं अतः इसे कर्मकाण्ड प्रधान कहते हैं ।। इसमें कुल 40 अध्याय हैं ।। 1975 मंत्र हैं ।। इसमें 1230 गुङ्कार (वैदिक अनुस्वार चिन्ह) ,, इस प्रकार के हैं ।। इसकी 101 शाखाएँ हैं और इसका धनुर्वेद उपवेद हैं ।। शतपथ इसका ब्राह्मण है ।।
यजुर्वेद में गायत्री गुरुमंत्र अध्याय 3 मंत्र 35 अध्याय 22 मंत्र 9, अध्याय 30 मंत्र 2 तथा अध्याय 36 मंत्र 3 में व्याहृति सहित आया है ।। यह सब से अधिकार चार बार इसी में आया है ।।
(3) सामवेद– सरस्वर ग्राम गेय (गानात्मक) होने से इसे ‘उपासना काण्ड’ कहते हैं ।। इसमें 1875 मंत्र हैं ।। इनके 8 ब्राह्मण ग्रन्थ हैं ।। इसकी 1000 शाखाएँ हैं ।। इसका ‘गान्धर्ववेद’ उपवेद है ।। गायत्री गुरु मंत्र -सामवेद प्रपाठक 6 अ. 13 खं. 14 सूक्त 10 में आया है ।
(4) अथर्ववेद– में कला कौशल (शिल्प शास्त्र) और औषधादि मंत्र- तंत्र निर्माण की (सूक्ष्म आध्यात्मिक ज्ञान सम्बन्धी) विशेष बातें हैं ।। अतः इसे ‘विज्ञान- काण्ड’ भी कहते हैं ।। इसके कुल 20 काण्ड 111 अनुवादक 731 सूक्त तथा 5977 मंत्र हैं ।। इसका गोपथ ब्राह्मण हैं ।। इसकी 9 शाखाएँ हैं और इसका ‘अथर्ववेद उपवेद है ।’
अथर्ववेद में एक बार भी गायत्री का पाठ नहीं परन्तु फलश्रुति आवश्यक है और वह किसी भी वेद में नहीं-
”स्तुता मया वरदा वेद माता प्रचोदयन्ताम् पावमानी द्विजानाम् आयुः प्राणं, प्रजानां, पशुं, कीर्ति, द्रविणं ब्रह्मवर्चस् ।। मह्यम् दत्वा ब्रजव ब्रह्म लोकम् ।” (अथर्व 19- 71)
इसमें गायत्री को 3 विशेषणों से विभूषित किया है ।। पहला ”वरदा” वर देने वाली अर्थात् ”यत् यत् वृणीने, तत् तत् ददालीनि वरदा”- इस व्युत्पति के आधार पर शुभ कामनाओं की पूर्ति करने वाली परिलक्षित है ।। साधकों की इच्छाओं को पूर्ण करने के कारण इसे कल्पवृक्ष कहते हैं ।।
चूँकि इसकी आध्यात्मिक दुग्ध- धारा का पान करने से त्रिविधि दुःखों का निवारण हो जाता है ।। किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं रहता ।। देवताओं की भाँति सदा सन्तुष्ट, प्रसन्न तथा सुसम्पन्न रहता है ।।
इसके पास कोई अपनी कुछ कामना लेकर जाता है तो उसकी इच्छा तुरन्त पूरी हो जाती है, इसलिए इसे भूलोक की कामधेनु भी कहते हैं इसे पारस मणि भी कहते हैं क्योंकि लोहे जैसे कलुषित अन्तःकरण भी सोने जैसे शुद्ध हो जाते हैं ।।
जहाँ गायत्री रूपी प्रकाश जाता है वहाँ से दुर्विचार और दुर्भावना रूपी अन्धकार अपना स्थान छोड़ देता है ।। जब अन्तःकरण पवित्र हो जाता है, मन पर चढ़े हुए सभी मल विक्षेप कट जाते हैं, ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, निन्दा ,, बेईमानी, काम, क्रोध, लोभ, अहंकार की अनाधिकार चेष्टाओं से रहित हो जाता है-
सत्य, प्रेम, न्याय, दया, ईमानदारी संयम, सहानुभूति आदि गुणों का विकास हो जाता है, तभी भगवान् दर्शन देते हैं ।। इसलिए
”वरं श्रेष्ठ परमेष्ठिनं प्रजापति ददाति साक्षात्कारयति” इस निरुक्ति से तो परम पिता परमात्मा का साक्षात्कार कराने वाली प्रतिपादित होती है ।।
‘वेद माता’ शब्द तो वात्सल्य से ओत- प्रोत है ।। ”वेदस्य वेदानां वा माता” यदि यह कहें, तब यह अर्थ होगा कि ज्ञान की नायिका शक्ति अथवा वेदों की पूर्णमान्य ।।
‘वेदानां मातरं मन्यन्ते सा वेद मात’
इस व्युत्पत्ति के अनुसार वेद स्वयं गायत्री को अपनी माता स्वीकार करते हैं ।। इसी प्रकरण में अथर्व वेद में यज्ञ मन्त्र आया है-
अव्यसश्च व्ययसश्च बिलं विष्यामि मायया ।।
नाभ्यामुदधृत्य वेदमव्यो कर्माणि क्रामहे ॥ -अथर्व० १९/६९/१
इसका भाव यह है कि ”मैं पुरुष और प्रकृति के समस्त रहस्यों को बुद्धि से खोलता हूँ और पुरुष और प्रकृति की साहचर्य लीला से ज्ञान को उद्धृत करके तत्पश्चात् कर्म में प्रवृत्त होता हूँ ।”
अनुभव भी यही बतलाता है कि जब साधक बुद्धि और ज्ञान की जन्मदाता गायत्री माता से अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है और दृढ़ श्रद्धा, विश्वास, भावना और तपश्चर्या द्वारा वह निरन्तर आगे बढ़ता जाता है तो उसके अन्तःकरण में ऐसे सद्विचारों और सद्भावों का उदय होता है, जो ऋषि मुनियों के मन में अवतरित होकर बड़े मन्त्रों को शोभायमान कर रहे हैं ।।
चूँकि इस महाशक्ति के आवाहन से ही वेद- मन्त्रों का अवतरण हुआ इसलिए इसे वेदमाता कहते हैं ।। इसी लिए गायत्री मन्त्र के दृष्टा महर्षि विश्वामित्र का कहना है कि ”गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मन्त्र नहीं है ।। सम्पूर्ण वेद, यज्ञ, दान, तप गायत्री की एक कला के समान भी नहीं हैं ।’
योगिराज याज्ञवल्क्य भी अपने अनुभव के आधार पर कहते हैं- ”गायत्री और समस्त वेदों को तराजू में तौला गया, एक ओर षट् अंगों समेत वेद ओर दूसरी ओर गायत्री को रखा तो गायत्री का पल्ला भारी निकला .जो द्विज गायत्री परायण नहीं वह वेदों का पारंगत होते हुए भी शूद्र के समान है ।।
अन्यत्र किया हुआ उसका श्रम व्यर्थ है ।’ इसीलिए वेदारम्भ के पूर्व गायत्री के जप व मनन आदि का आदेश देते हैं, क्योंकि गायत्री द्वारा ही वेद मन्त्रों के अर्थ खुलते हैं ।।
एक बार माता और पिता से जन्म ग्रहण करके जो आचार्य पिता और सावित्री माता से जन्मते हैं वह ही निश्चय से द्विज हैं और ऐसे द्विजों को पवित्र- तम बनाने वाली, उनके पापों को नाश करने वाली गायत्री है, इसलिए इसे ”पावमानी द्विजानाम्’ का विशेषण दिया गया है ।।
गायत्री की सविता शक्ति निरन्तर सत्प्रेरणा करती रहती है ।। सत्य और असत्य को निर्णय करके सत्य को ग्रहण करने और असत्य को त्यागने का आदेश देती रहती है ।।
गायत्री की मंत्र शक्ति साधक की सभी बुराइयों, दुर्बलताओं और कुप्रवृत्तियों को भस्म कर देती है, संसार के जन्म मृत्यु आदि दुःखों के कारण मूल भूत पापों को नाश करती है ।। प्रकाश द्वारा आन्तरिक अन्धकार को दूर करती है ।। इसलिए इसे पाप नाशिनी कहते हैं ।।
वेद भगवान की घोषणा है कि गायत्री माता आशीर्वाद के रूप में अपने पुत्रों को आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, द्रविणं, ब्रह्म वर्चस प्रदान करती है ।। यही विश्व मानव की सबसे बड़ी सम्पत्ति है ।। इनकी प्राप्ति से अभाव, अशक्ति और अज्ञान के तीनों प्रकार के दुःखों की निवृत्ति हो जाती है ।।
जिस देश में दीर्घ, बलिष्ठ प्राण, सुसन्तति, अष्टांग पशु तथा श्रेयस्कर, धनवान, ब्रह्मवर्चस्वी नवयुवक उत्पन्न हों, वह राष्ट्र को उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचा देते हैं ।। उन लाभों की प्राप्ति का मूल कारण सद्बुद्धि की प्राप्ति ही है ।।
सद्बुद्धि का उद्गम केन्द्र गायत्री है ।। इसलिए उपरोक्त फलों को प्रत्यक्ष करने के लिए गायत्री माता की गोद में बैठकर उसके शक्तिमयी दुग्ध का पान करना चाहिए ।।
(गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन पृ. 1.51)

शक्ति की अधिष्ठात्री त्रिपदा गायत्री


संसार के समस्त दुःखों के तीन प्रधान कारण हैं-
(1)अज्ञान, (2) अभाव, (3) अशक्ति ।।
सत्, रज, तम, की त्रिविधि प्रकृति से मनुष्य का निर्माण हुआ है। वस्तुतः सत्ता दो की है ।। सत् और तम की ।। रज की उत्पत्ति तो दोनों की सम्मिश्रण से होती है ।। दुःखों के कारणों में भी प्रधान दो ही हैं- अज्ञान और अशक्ति ।। अभाव तो उनकी परिणति है ।।
गायत्री की तीन शक्ति धाराएँ हैं- ह्रीं, श्रीं और क्लीं ।। ह्रीं सद्ज्ञान की, श्रीं वैभव की और क्लीं शक्ति की बल प्रतीक है ।।
सत्- रज, तम से बनी काया को आवश्यकता तीनों ही शक्ति धाराओं की है ।।
इनमें किसी का भी महत्त्व कम नहीं है ।। तीनों का सन्तुलन आवश्यक है ।। जीवन निर्वाह के लिए जितना महत्त्व ज्ञान का है उतना ही साधनों एवं शक्ति का एक भी पक्ष छोड़ा नहीं जा सकता ।। गायत्री महामन्त्र में तीनों शक्ति धाराओं का समान रूप में समावेश है ।।
ह्रीं को सत् या सरस्वती कहते हैं ।। ज्ञान की अधिष्ठात्री के रूप माँ सरस्वती की अभ्यर्थना, उपासना भारतीय संस्कृति में सदियों से होती चली आ रही है ।। तत्त्ववेत्ता ऋषि इस तथ्य से अवगत थे कि सद्ज्ञान के बिना मनुष्य का कल्याण सम्भव नहीं ।।
इसलिए उन्होंने गायत्री मंत्र का आश्रय लिया ।। सद्ज्ञान की ओर ले चलने वाला सर्व समर्थ मंत्र घोषित किया ।।
यह ऋषियों की परम्परा रही है कि ज्ञान एवं शक्ति धाराओं को उत्पन्न करने वाली दैवी शक्तियों को ‘माँ’ के रूप में विभूषित किया जाता है ।।
तत्व ज्ञानियों की शृंखला में आने वाले प्रत्येक महामानव ने गायत्री के ह्रीं सत् शक्ति की उपासना द्वारा असाधारण सामर्थ्य प्राप्त की है ।। चाहे वह रामकृष्ण परमहंस हो अथवा योगीराज अरविन्द ।। अथवा महर्षि रमण ।। विवेकानन्द से लेकर स्वामी रामतीर्थ तक सभी के ऊपर माँ सरस्वती की वरद्हस्त रहा है ।। ज्ञान सम्पदा का अनुग्रह, आत्मज्ञान की प्राप्ति गायत्री महाशक्ति द्वारा सम्भव हो सकी है ।।
अन्यान्य सभी प्रकार की सम्पदाओं की अपेक्षा ज्ञान की महत्ता सर्वोपरि है ।। इसके अभाव में जीवन यों ही अस्त- व्यस्त बना रहता और मूल्यवान मनुष्य जीवन निरर्थक चला जाता है ।। अपनी गरिमा एवं लक्ष्य का बोध न रहने से ईश्वर प्रदत्त क्षमताओं का सदुपयोग नहीं हो पाता ।।
उपभोग की पशु- प्रवृत्ति के कारण सदा असन्तोष ही बना रहता है ।। अज्ञान के रहते मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, मोह की संकीर्ण परिधि से बाहर नहीं निकल पाता ।। अपनी संकीर्ण प्रवृत्तियाँ ही उलटकर हमला करती और मनुष्य को चैन से बैठने नहीं देती हैं ।। वासना, तृष्णा और अर्हता की पूर्ति के लिए असन्तुष्ट बना वह वस्तुओं के पीछे पागल के समान भागता है ।।
अज्ञान ही समस्त दुःखों की जननी है जिसके रहते मनुष्य सम्पन्नता का लाभ नहीं उठा सकता ।। सुखी तो दूर रहा, मिली सम्पदा दुःखदायी बोझ के तुल्य सिद्ध होती है ।। इस सत्य को वर्तमान में सर्वत्र देखा जा सकता है ।। सम्पन्नता साधनों की दृष्टि से आज का मनुष्य भूतकाल की तुलना में बहुत आगे है ।। सारा संसार ही सिमट कर एक छोटे घेरे में आ गया है, यह साधनों का ही चमत्कार है ।।
बुद्धि का भी असामान्य विकास हुआ है किंतु अन्तः में निवास करने वाले ‘धी’ तत्व में भारी कमी आयी है ।। प्रज्ञा का स्थान बुद्धि की जड़ता ने ले लिया है ।। फलतः बुद्धि भी जड़वाद की ही पक्षधर बनती चली जा रही है ।।
समर्थन जब जड़ को मिली है तो चेतना की गरिमा की बात क्यों कर समझ में आये ।। साधनों के संग्रह की आपाधापी में विश्व मानस ने चेतना की महत्ता को लगभग भुला दिया है ।।
लोकमान्य तिलक कहते हैं-
‘जिस बहुमुखी दासता के बंधनों में मानव जाति जकड़ी हुई है उसका अन्तः राजनैतिक संघर्ष करने मात्र से न हो जायेगा । उसके लिए आत्मा के अन्दर प्रकाश उत्पन्न होना चाहिए जिससे सत् और असत् का विवेक जागे ।। कुमार्ग को छोड़कर श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले, गायत्री मंत्र में यही भावना विद्यमान है ।।
इस तथ्य को जानते हुए योगीजन, ब्रह्मवेत्ता, अध्यात्मवादी, तत्त्वदर्शी, जीवन साधक, दार्शनिक, परमार्थी व्यक्ति प्रकारान्तर से ह्रीं तत्व की- सरस्वती की ही आराधना- उपासना करते रहते हैं ।। इन सबका विभिन्न माध्यमों से एकमात्र लक्ष्य है- मनुष्य को असत् से सत् की ओर ले चलना ।।
गायत्री उपासना से आत्मिक आवश्यकताओं की ही मात्र पूर्ति नहीं होती ।। अपितु भौतिक साधनों की भी आपूर्ति होती है ।। गायत्री की श्रीं शक्ति धारा द्वारा भौतिक साधन सम्वर्धन की सुसम्पन्नता अर्जन की विवेक बुद्धि प्राप्त होती है ।।
यह स्वाभाविक है कि प्रगति के प्रयास तो भौतिक स्तर पर ही करने पड़ेंगे ।। पर उन पर विवेक का अंकुश होने से भटकाव की गुंजाइश नहीं रहती ।। ऐसी योग्यता, प्रतिभा सृजनात्मक
दिशा में ही नियोजित होती है ।। व्यक्ति एवं समाज के सामूहिक उत्थान की ही बात रचती है ।। गायत्री की श्रीं लक्ष्मी शक्ति धारा विभूतियों की अधिष्ठात्री है ।।
श्रीं तत्व के उपासक को अपना ही स्वार्थ अभीष्ट नहीं होता वरन् वह सम्पूर्ण समाज की प्रगति की बात सोचता है ।। सामूहिक विकास में ही उसे अपना सच्चा स्वार्थ दिखता है ।।
उसके सारे प्रयास उसी दिशा में लगे रहते हैं ।। बुद्धिवादी, धर्म- प्रचारक, सुधारवादी, समाजसेवी श्रीं शक्ति की सुव्यवस्था में लगकर लक्ष्मी के उपार्जन में सफल हो पाते हैं ।। गायत्री की श्रीं शक्तिधारा में व्यक्ति एवं समाज के भौतिक विकास के सभी समाधान विद्यमान हैं ।। वैभव की वृद्धि ही नहीं उनका सदुपयोग सम्पूर्ण मानव जाति के लिए किस प्रकार किया जा सकता है, वह विवेक बुद्धि भी गायत्री उपासना से ही मिलती है ।।
यही कारण है कि सच्चा गायत्री उपासक साधन सम्पन्न होते हुए भी निर्लिप्त बना रहता है ।। अपने लिए कम से कम साधनों का उपयोग करता है ।। व्यापक स्तर पर विद्यमान अभाव, दरिद्रता के निवारण में ही उसे शाश्वत आनंद की अनुभूति होती है ।।
श्रीं तत्व की अवहेलना करने वाला व्यक्ति संकीर्ण बनता है ।।
व्यक्तिगत उपभोग के लिए ही वह सारे ताने- बाने बुनता है ।। समाज से उपार्जित सम्पत्ति का वह संग्रह तो करता है, पर उसका उपयोग स्वयं करता है ।। इसके विपरीत श्रीं तत्व का उपासक लक्ष्मी का सच्चा साधक सम्पत्ति का मोह नहीं रखता ।। उसे उपभोग में नहीं, सम्पत्ति को सदुपयोग में आनन्द आता है ।। समाज की उन्नति के लिए वह अपनी सम्पत्ति सहर्ष समर्पित करता है ।।
गायत्री की ‘क्लीं’ तत्व भौतिक सामर्थ्य का प्रतीक है ।। उसे ही गायत्री की शक्ति धाराओं में ‘काली’ के रूप में अलंकृत किया गया है ।। ज्ञान एवं साधन हो किन्तु शक्ति न हो उनका उपयोग नहीं बन पड़ता ।। शक्ति रहित व्यक्ति के पास साधन भी अधिक दिन तक टिके नहीं रह सकते ।। कमजोर, अशक्त न तो अपनी सुरक्षा रख सकता है न ही अपनी सम्पदा का ।। शक्ति के अभाव में अर्जित ज्ञान भी लाभ नही मिल पाता ।। इसी कारण ऋषियों ने ज्ञान सम्पादन ही नहीं शक्ति संचय पर भी जोर दिया है ।।
मानवी अन्तराल में ऐसे शक्ति केन्द्र छिपे पड़े हैं जिनको जागृत किया जा सके तो मनुष्य शक्ति का पुंज बन सकता हे ।। वे सुषुप्तावस्था में पड़े हैं ।। ‘क्लीं’ की महाकाली की उपासना द्वारा इन शक्ति केन्द्रों को जागृत किया जा सकता है ।।
कुण्डलिनी जागरण इस क्लीं शक्ति की आराधना की ही फलश्रुति है । अन्तः जागरण की इस प्रक्रिया से इतनी सामर्थ्य प्राप्त की जा सकती है जितनी कि परमाणु द्वारा भी नहीं हो सकी है ।।
अज्ञान, अभाव एवं अशक्ति के निवारण हेतु त्रिपदा गायत्री की तीन शक्ति धाराओं ह्रीं, श्रीं और क्लीं की उपासना की जानी चाहिए ।। ज्ञान, सम्पदा एवं शक्ति के तीनों ही अनुदान आद्य शक्ति गायत्री की ही अनुकम्पा से मिलते हैं ।। इस महाशक्ति का अंचल श्रद्धापूर्वक पकड़ा जा सके तो अज्ञान, अभाव एवं अशक्ति की स्थिति ही समाप्त हो जाय, ज्ञान, वैभव एवं सामर्थ्य की त्रिवेणी साधक में फूट पड़े ।।
(गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन पृ. 1.23)

गायत्री महाविद्या का तत्वदर्शन प्राचीन यज्ञ


(1) राजसूय यज्ञ– जिस सम्मेलन में सुसंगठित होकर राजा का चुनाव किया जाता है, ऐसे संगठन को राजसूय यज्ञ कहते हैं ।। इसका इसका वर्णन अथर्ववेद के 4/8 सूक्त में देखा जा सकता है ।। इस सम्बन्ध में शतपथ ब्राह्मण 13/2/2/1 में उल्लेख है-
प्राज्ञः एवं सूयं कर्मः ।। राजा वै राजसूयेन दृष्टवा भवति ।।
अर्थात्- शासन व्यवस्था को राजसूय कहते हैं ।। राजा इस आयोजन के उपरान्त ही शासन की बागडोर संभालता है ।। आज की स्थिति में संसद विचार मंथन एवं चुनाव आयोजनों को राजसूय कह सकते हैं ।। प्रज्ञा की सहमति से प्रजापति को प्रमुखता देते हुए की जाने वाली शासन व्यवस्था राजसूय है ।।
इस प्रयोजन के लिए समय- समय पर जनसाधारण को भी एकत्रित करके सभा- सम्मेलनों के रूप में उसका मत जाना जाता था और लोक मानस क सामयिक मार्ग- दर्शन का प्रबन्ध किया जाता था, इस उद्देश्य के लिए होने वाले सभा- सम्मेलनों, वार्षिक आयोजनों को भी यही नाम दिया जा सकता है ।।
विभिन्न संस्थाएँ, शासकीय सुव्यवस्था बनाने के लिए प्रस्तुत गतिविधियों की समीक्षा उपयुक्त प्रवृत्तियों में सहयोग करने तथा आवश्यक सुधार के लिए परामर्श देने जैसे प्रयोजनों को लेकर जन सम्मेलन होते रहते हैं, वह भी इसी श्रेणी में आते हैं ।।
विशेष परिस्थितियों में विशेष परिस्थितियों के अनुरूप सामयिक निर्णय करने एवं योजना बनाने की किसी बड़ी बात को लेकर विशालकाय राजसूय यज्ञ होते हैं ।। महाभारत के बाद भगवान कृष्ण ने और लंका विजय के उपरान्त राम ने भावी निर्धारणों के लिए जनता का परामर्श सहयोग प्राप्त करने के लिए विशालकाय राजसूय यज्ञ किये थे ।। ऐसे ही विशाल आयोजन समय- समय पर अन्यत्र भी होते हैं ।।
(2) वाजपेय यज्ञ– वाजपेय यज्ञों में भी राजसूय यज्ञों की तरह ही धर्मक्षेत्र में सन्तुलन बनाये रहने के लिए लोकसेवी विद्वान परिव्राजक एकत्र होकर सामयिक परिस्थितियों पर विचार करते थे ।। जो आवश्यक होता था, उसका निर्धारण करके अपने- अपने कार्य- क्षेत्रों में लौटते थे ।। वाजपेय सम्मेलनों में निर्धारित की गई नीति एवं योजना को कार्यान्वित करने के लिए विज्ञजनों को तत्पर किया जाता था ।।
तद्नुरूप वातावरण बनाने, साधन जुटाने की सार्वजनिक योजना चल पड़ती थी ।। साधारणतया वे ‘कुम्भ’ जैसे पर्वों के निर्धारित समय पर होते थे और विशेष आवश्यकता पड़ने पर विशेष रूप से किन्हीं स्थानों पर वाजपेय यज्ञों के आयोजन होते थे ।।
(3) विश्वजित यज्ञ– इस यज्ञ द्वारा एक राष्ट्र या मानव समुदाय अपनी विशाल हृदयता, प्रेम और शक्ति के प्रभाव से सारे विश्व पर अपना आधिपत्य कायम कर सकता है ।।
(4)अश्वमेध यज्ञ– शतपथ के राष्ट्रं वा अश्वमेधः वीर्यं वा अश्वःवचनानुसार राष्ट्र और उसकी शक्तियों की भली- भाँति संगठन करनी ही अश्वमेध यज्ञ है ।।
(5) पुरुषमेधे अपने- अपने वैयक्तिक स्वार्थों को छोड़कर राष्ट्र के ही उत्थान के लिए अपना जीवन अर्पित कर देना पुरुषमेध यज्ञ है ।। ऐसे लोगों को कभी- कभी संग्राम और दुष्टों के दमन करने में प्रत्यक्ष ही जीवन या प्राण का बलिदान कर देना पड़ता है ।। इसका वर्णन बौद्ध ग्रन्थों में मिलता है ।।
(6) गौ मेध– गौ जाति के उपयोग से भूमि को जोतकर तथा खाद्य से उर्वरा बनाकर भूमि को अधिकतम भोज्य सामिग्री उत्पन्न करने योग्य बनाना ही गो मेध है ।।
(7) सर्वमेध– किसी उच्च यज्ञ के लिए जब निचला यज्ञ (संगठन) सब कुछ बलिदान कर देता है, तो उसे ‘सर्वमेध’ कहा जाता है ।।
विशिष्ट प्रयोजनों के लिए कई बार व्यक्ति विशेष द्वारा उक्त यज्ञों में से जिसका निश्चय किया हो उसकी सार्वजनिक घोषणा के लिए एक विशाल आयोजन सम्पन्न किया जाता था, तो कई बार मूर्धन्य पुरोहितों द्वारा परिव्राजकों की, वानप्रस्थ संन्यासियों की दीक्षा के सार्वजनिक समारोह बुलाये जाते थे और उनमें सामूहिक संस्कार होते थे ।।
अश्वमेध की एक विशेष प्रक्रिया राजसूय स्तर की भी सम्पन्न होती रही है ।। सामन्तवादी उच्छृंखलता के कारण शासकों के अनाचार प्रजापीड़क न बनने पाएँ, इसलिए उन्हें सर्वत्र स्वतंत्र नहीं रहने दिया जाता था ।। उन्हें किसी केन्द्रीय नियन्त्रण के अन्तर्गत रखने के लिए समय- समय पर ऐसे आयोजन होते रहते थे, जो स्वेच्छाचारिता का आग्रह करते थे, उन्हें बलपूर्वक वैसा करने से रोका जाता था ।।
इसी प्रकार वाजपेय यज्ञों के अन्तर्गत भी ‘दिग्विजय’ अभियान चलते थे, विचारों ,, सम्प्रदायों को स्वेच्छाचारिता की आदर्शवादी दिशाधारा के अन्तर्गत रखने के लिए समर्थ आत्मवेत्ता ‘दिग्विजय’ के लिए निकलते थे ।।
शास्त्रार्थ जैसे विचार- युद्ध ऐसे ही प्रयोजनों के लिए होते थे ।। जो हारता था उसे पृथकतावादी आग्रह छोड़कर संयुक्त प्रवाह में बहने के केन्द्रीय अनुशासन में रहने के लिए विवश किया जाता था ।।
आद्य शंकराचार्य जैसे अनेकों राष्ट्र संत समय- समय पर ऐसी ही दिग्विजय अभियानों के लिए निकले हैं ।। ऐसे सार्वजनिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किये गये धर्म- सम्मेलन अश्वमेधों की गणना में गिने जाते रहे हैं ।। आत्मशोधन एवं परमार्थ समर्पण की प्रक्रिया नरमेध, सर्वमेध के रूप में जानी जाती रही है ।।

गायत्री और ब्रह्म की एकता


गायत्री कोई स्वतंत्र देवी- देवता नहीं है ।। यह तो परब्रह्म परमात्मा का क्रिया भाग है ।। ब्रह्म निर्विकार है, अचिन्त्य है, बुद्धि से परे है, साक्षी रूप है, परन्तु अपनी क्रियाशील चेतना शक्ति रूप होने के कारण उपासनीय है और उस उपासना का अभीष्ट परिणाम भी प्राप्त होता है ।।
ईश्वर- भक्ति, ईश्वर- उपासना, ब्रह्म- साधना, आत्म- साक्षात्कार, ब्रह्म- दर्शन, प्रभु- परायणता आदि पर्यायवाची शब्दों का जो तात्पर्य और उद्देश्य है वही ‘गायत्री उपासना’ आदि स्त्री-वाची शब्दों का मन्तव्य है ।।
गायत्री उपासना वस्तुतः ईश्वर उपासना का एक अत्युत्तम सरल और शीघ्र सफल होने वाला मार्ग है ।। इस मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति एक सुरम्य उद्यान से होते हुए जीवन के चरम लक्ष्य ‘ईश्वर- प्राप्ति’ तक पहुँचते हैं ।। ब्रह्म और गायत्री में केवल शब्दों का अन्तर है, वैसे दोनों ही एक हैं ।।
इस एकता के कुछ प्रमाण नीचे देखिये
गायत्री छन्दसामहम ॥ (श्रीमद्भगवद् गीता अ.- १०.३५)
छन्दों में मैं गायत्री छन्द हूँ ।।
भूभुर्वः स्वरिति चैव चतुर्विंशाक्षरा तथा ।।
गायत्री चतुरो वेदा ओंकरः सर्वमेव तु ॥ (बृ.यो. याज्ञ. २/६६)
भूभुर्वः स्वः यह तीन महाव्याहृतियाँ, चौबीस अक्षर वाली गायत्री तथा चारों वेद निस्संदेह ओंकार ब्रह्मस्वरूप हैं ।।
देवस्य सवितुर्यस्य धियो यो नः प्रचोदयात् ।।
भर्गो वरेण्यं तद्ब्रह्म धीमहीत्यथ उच्यते ॥ (विश्वामित्र)
उस दिव्य तेजस्वी, ब्रह्म का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करता है।
अथो वदामि गायत्रीं तत्त्वरूपां त्रयीमयीम् ।।
यया प्रकाश्यते ब्रह्म सच्चिदानन्दलक्षणम ॥ (गायत्री तत्व श्लोक १)
त्रिवेदयमी (वेदत्रयी) तत्त्व स्वरूपिणी गायत्री को मैं कहता हूँ, जिससे सच्चिदानंद लक्षण वाला ब्रह्म प्रकाशित होता है अर्थात् ज्ञात होता है ।।
गायत्री वा इदं सर्वम् ॥ (नृसिंहपूर्वतापनीयोप. ४/३)
यह समस्त जो कुछ है, गायत्री स्वरूप है ।।
गायत्री परमात्मा ।। (गायत्री तत्व.)
गायत्री (ही) परमात्मा है ।।
ब्रह्म गायत्रीति- ब्रह्म वै गायत्री ।(शतपथ ब्राह्मण ८/५/३/७ ऐतरेय ब्रा.अ.१७ खं. ५)
ब्रह्म गायत्री है, गायत्री ही ब्रह्मा है ।।
सप्रभं सत्यंमानंदं हृदये मण्डलेऽपि च ।।
ध्यायञ्जपेत्तदित्येतन्निष्कामो मुच्यतेऽचिरात् ॥ (विश्वमित्र)
प्रकाश सहित सत्यानंद स्वरूप ब्रह्म को हृदय में और सूर्यमण्डल में ध्यान करता हुआ, कामना रहित हो गायत्री मंत्र को यदि जपे, तो अविलम्ब संसार के आवागमन से छूट जाता है।
ओंकारस्तत्परं ब्रह्म सावित्री स्यात्तदक्षरम्॥ (कूर्म पुराण उ.विभा.अ. १४/५७)
ओंकार परब्रह्म स्वरूप है और गायत्री भी अविनाशी ब्रह्म है ।।
गायत्री तु परुश तत्त्वं गायत्री परमागतिः ॥
(बृहत्पाराशर गायत्री मंत्र पुरश्चरण वर्णनम् ४/४)
गायत्री परम तत्त्व है, गायत्री परम गति है ।।
सर्वात्मा हि सा देवी सर्वभूतेषु संस्थिता ।।
गायत्री मोक्षहेतुश्च मोक्षस्थानंमसंशयम् ॥ (ऋषि शृंग)
यह गायत्री देवी समस्त प्राणियों में आत्मा रूप में विद्यमान है, गायत्री मोक्ष का मूल कारण तथा संदेह रहित मुक्ति का स्थान है ।।
गायत्र्येव परो विष्णुर्गायत्र्येव परः शिवः ।।
गायत्र्येव परो ब्रह्म गायत्र्येव त्रयी ततः ॥ (स्कंद पुराण, काशीखण्ड ४/९/५८, बृहत्संध्या भाष्य)
गायत्री ही दूसरे विष्णु हैं और शंकरजी दूसरे गायत्री ही हैं ।। ब्रह्माजी भी गायत्री में परायण हैं, क्योंकि गायत्री तीनों देवों का स्वरूप है ।।
गायत्री परदेवतेति गदिता ब्रह्मैव चिद्रूपिणी ॥३॥ (गायत्री पुरश्चरण)
गायत्री परम श्रेष्ठ देवता और चित्त रूपी ब्रह्म है, ऐसा कहा गया है ।।
गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच ॥ (छान्दोग्योपनिषद् ३/१२/१)
यह विश्व जो कुछ भी है, वह समस्त गायत्रीमय है ।।
नभिन्नां प्रतिपद्यते गायत्रीं ब्रह्मणा सह ।।
सोऽहमस्मीत्युपासीत विधिना येन केनचित ॥ (व्यास)
गायत्री और ब्रह्म में भिन्नता नहीं है ।। अतः चाहे जिस किसी भी प्रकार से ब्रह्म स्वरूपी गायत्री की उपासना करे ।।
गायत्री प्रत्यग्ब्रह्मैक्यबोधिका ॥ (शांकर भाष्य)
गायत्री प्रत्यक्ष अद्वैत ब्रह्म की बोधिका है ।।
परब्रह्मस्वरूपा च निर्वाणपददायिनी ।।
ब्रह्मतेजोमयी शक्तिस्तदधिष्ठातृ देवता ॥
(देवी भागवत् स्कन्ध ९ अ. १ /४२)
गायत्री मोक्ष देने वाली, परमात्म स्वरूप और ब्रह्मतेज से युक्त शक्ति है और मंत्रों की अधिष्ठात्री है ।।
गायत्र्याख्यं ब्रह्म गायत्र्यनुगतं गायत्री मुखेनोक्त म ॥ (छान्दोग्य. शांकर भाष्य ३/१२/१५)
गायत्री स्वरूप एवं गायत्री से प्रकाशित होने वाला ब्रह्म गायत्री नाम से वर्णित है ।।
प्रणवव्याहृतिभ्याञ्च गायत्र्या त्रितयेन च ।।
उपास्यं परमं ब्रह्म आत्मा यत्र प्रतिष्ठितः ॥
(तारानाथ कृ.गा.व्या. पू. २५)
प्रणव, व्याहृति और गायत्री इन तीनों से परम ब्रह्म की उपासना करनी चाहिये, उस ब्रह्म में आत्मा स्थित है ।।
ते वा पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् देवास्य कुले वीरों जायते प्रतिपद्यते स्वर्गलोकम ॥ (छा. ३/१३/६)
हृदय चैतन्य ज्योति रूप ब्रह्म के प्राप्ति स्थान के प्राण, व्यान, अपान, समान, उदान ये पाँच द्वारपाल हैं ।। अतः इन्हीं को वश में करे, जिससे हृदयस्थित गायत्री स्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति हो ।। उपासना करने वाला स्वर्गलोक को प्राप्त होता है और उसके कुल में वीर पुत्र या शिष्य उत्पन्न होता है ।।
भूमिरन्तरिक्षं द्यौरितयष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत्स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद॥ (बृह. ५/१४/१)
भूमि, अन्तरिक्ष, द्यौ- ये तीनों गायत्री के प्रथम पाद के आठ अक्षरों के बराबर हैं ।। अतः जो गायत्री के प्रथम पद को भी जान लेता है, वह त्रिलोक विजयी होता है ।।
स वै नैव रेमे, तस्मादेकाकी न रमते, सद्वितीयमैच्छत् ।।
सहैतावानास ।। यथा स्त्रीपुमान्सौ संपरिष्वक्तौ स ।।
इममेवात्मानं द्वेधा पातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवताम्॥ (बृह. १/४/३)
वह ब्रह्म रमण न कर सका, क्योंकि अकेला था ।। अकेला कोई भी रमण नहीं कर सकता । उसका स्वरूप संयुक्त स्त्री- पुरुष की भाँति था ।। उसने दूसरे की इच्छा की तथा अपने संयुक्त रूप को द्विधा विभक्त किया, तब दोनों रूप पत्नी और पति भाव को प्राप्त हुए ।।
निर्गुणः परमात्मा तु त्वदाश्रयतया स्थितः ।।
तस्य भट्ठारिकासि त्वं भवनेश्वरि! भोगदा ॥ (शक्ति दर्शन)
परमात्मा निर्गुण है और तेरे ही आश्रात् ठहरा हुआ है ।। तू ही उसकी साम्राज्ञी और भोक्ता है ।।
शक्तिश्च शक्ति मद्रूपाद् व्यतिरेकं न वाञ्छित ।।
तादात्म्यमनयोर्नित्यं वह्निदाहिकयोरिव ॥ (शक्ति दर्शन)
शक्ति, शक्तिमान् से कभी पृथक नहीं रहती ।। इन दोनों का नित्य संबंध है ।। जैसे अग्नि और दाहक शक्ति का नित्य परस्पर संबंध है, उसी प्रकार शक्तिमान् का भी है ।।
सदैकत्वं न भेदोऽस्ति सर्वदैव ममास्य च ।।
योऽसौ साहमहं योऽसौ भेदोऽस्ति मतिविभ्रमात ॥ (देवी भागवत् पु. ३/६/२)
शक्ति का और उस शक्तिमान् पुरुष का सदा संबंध है, कभी भेद नहीं है ।। जो वह है, सो मैं हूँ और जो मैं हूँ, सो वह है ।। यदि भेद है, तो केवल बुद्धि का भ्रम है ।।
जगन्माता च प्रकृतिः पुरुषश्च जगत्पिता ।।
गरीयसी त्रिजगतां माता शतगुणैः पितुः ॥ (ब्र.वै.पु.कृ.ज.अ. ५२/३४)
संसार की जन्मदात्री प्रकृति है और जगत् का पालनकर्ता या रक्षा करने वाला पुरुष है ।। जगत् में पिता से माता सौगुनी अधिक श्रेष्ठ है।।
इन प्रमाणों से स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्म ही गायत्री है और उसकी उपासना ब्रह्म प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग है ।।
(गायत्री महाविज्ञान संयुक्त संस्करण पृ.सं. ११)

गायत्री महाविद्या का तत्वदर्शन_

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नाभिपद्म भुवा विष्णेब्रह्मणानिर्मितं जगत् ।।
स्थावरं जंगमं शक्त्या गायत्र्या एवं वै ध्रुवम॥
(विष्णोः) विष्णु की (नाभिपद्म भुवा) नाभि कमल से उत्पन्न हुए (ब्रह्मणा) ब्रह्मा ने (गायत्र्याः शक्त्या एव) गायत्री शक्ति से ही (स्थावरं जंगमं) जड़ तथा चेतन (जगत्) संसार को (निर्मितं) बनाया (वैध्रुवम्) यह निश्चय है ।।
अनादि परमात्म तत्व से ब्रह्म से यह सब कुछ उत्पन्न हुआ है ।। सृष्टि उत्पन्न करने का विचार उठते ही ब्रह्मा में एक स्फुरणा उत्पन्न हुई जिसका नाम है- शक्ति ।। शक्ति के द्वारा दो प्रकार की सृष्टि हुई एक जड़ दूसरी चैतन्य ।। जड़ सृष्टि का संचालन करने वाली शक्ति प्रकृति और चैतन्य सृष्टि को उत्पन्न करने वाली शक्ति का नाम सावित्री है ।।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि सृष्टि के आदि काल में भगवान की नाभि से कमल उत्पन्न हुआ, कमल के पुष्प में ब्रह्मा से सावित्री हुई, सावित्री और ब्रह्मा के संयोग से चारों वेद उत्पन्न हुए ।। वेद से समस्त प्रकार के ज्ञानों का उद्भव हुआ ।।
तदनंतर ब्रह्मा जी ने पंच भौतिक सृष्टि की रचना की ।। इस अलंकारिक गाथा का रहस्य यह है कि निर्लिप्त, निर्विकार, निर्विकल्प परमात्म तत्व की नाभि में से केन्द्र भूमि में से- अन्तःकरण में से- कमल उत्पन्न हुआ और वह पुष्प की तरह खिल गया ।।
श्रुति में कहा है कि सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा की इच्छा हुई कि ‘एकोऽहं बहुस्याम’ मैं एक से बहुत हो जाऊँ ।। यह उसकी इच्छा, स्फुरणा, नाभिदेश में से निकल कर बाहर प्रस्फुटित हुई अर्थात् कमल की लतिका उत्पन्न हुई और उसकी कली खिल गई ।।
इस कमल पुष्प पर ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं ।। यह ब्रह्मा, सृष्टि निर्माण की त्रिदेव- शक्ति का प्रथम अंश है, आगे चल कर वह त्रिदेव- शक्ति उत्पत्ति, स्थिति और नाश का कार्य करती हुई ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में दृष्टिगोचर होगी ।।
आरम्भ में कमल पुष्प पर केवल ब्रह्माजी ही प्रकट होते हैं क्योंकि सर्वप्रथम उत्पत्ति करने वाली शक्ति की आवश्यकता हुई
अब ब्रह्मा जी का कार्य आरम्भ होता है ।।
उन्होंने दो प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की, एक चैतन्य दूसरी जड़ ।चैतन्य सृष्टि के अन्तर्गत वे सभी जीव आ जाते हैं जिनमें इच्छा, अनुभूति, असंभावना पाई जाती है ।। चैतन्यता की एक स्वतंत्र सृष्टि हे जिसे विश्व का प्राणमय कोष कहते हैं ।।
निखिल विश्व में एक चैतन्य तत्व भरा हुआ है जिसे ‘प्राण तत्व के तीन वर्ग हैं और सत्, रज्, तम यह तीन इसके वर्ण हैं ।। इन्हीं तत्वों को लेकर आत्माओं के सूक्ष्म, कारण और लिंग शरीर बनते हैं ।। सभी प्रकार के प्राणी इसी प्राण तत्व से चैतन्यता एवं जीवन सत्ता प्राप्त करते हैं ।।
जड़ सृष्टि के निर्माण के लिए ब्रह्मा जी ने पंच भूतों को निर्माण किया ।। पृथ्वी, जल, वायु, तेज, आकाश के द्वारा विश्व के सभी परमाणुमय पदार्थ बने ।। ठोस, द्रव, गैस इन्हीं तीनों रूपों में प्रकृति के परमाणु अपनी गतिविधि जारी रखते हैं ।।
नदी, पर्वत, धातु, धरती आदि का सभी पसारा इन पंच भौतिक परमाणुओं का खेल है ।। प्राणियों के स्थूल शरीर भी इन्हीं प्रकृति जन्य पंच तत्वों के बने होते हैं ।।
क्रिया दोनों सृष्टियों में है ।। प्राणमय चैतन्य सृष्टि में अहंकार, संकल्प और प्रेरणा की गतिविधियाँ विविध रूपों में दिखाई पड़ती है ।। भूत मय जड़ सृष्टि में, शक्ति, हलचल और सत्ता इन आधारों के द्वारा विविध प्रकार के रंग रूप, आकर प्रकार बनते बिगड़ते रहते हैं ।।
जड़ सृष्टि का आधार परमाणु और चैतन्य सृष्टि का आधार संकल्प है ।। दोनों ही आधार अत्यन्त सूक्ष्म और अत्यन्त बलशाली हैं, इनका नाश नहीं होता केवल रूपान्तर होता रहता है ।।
जड़ चेतन सृष्टि के निर्माण में ब्रह्मा की दो शक्तियाँ काम कर रही हैं ।। (1) संकल्प शक्ति, (2) परमाणु शक्ति ।। इन दोनों में प्रथम संकल्प शक्ति की आवश्यकता हुई, क्योंकि बिना उसके चैतन्य का आविर्भाव न होता और बिना चैतन्य के परमाणु का उपयोग किसलिए होता ।।
अचैतन्य सृष्टि तो अपने आप में अन्धकार मय थी, क्योंकि न तो उसका किसी को ज्ञान होता है और न उसका कोई उपयोग होता ।। ‘चैतन्य’ के प्रकटीकरण की सुविद्या के लिए उसकी साधन सामग्री के रूप में ‘जड़’ का उपयोग होता है ।।
अस्तु आरम्भ में ब्रह्माजी ने चैतन्य बनाया, ज्ञान का संकल्प का आविष्कार किया, पौराणिक भाषा में यों कहिए कि सर्वप्रथम वेदों का उद्घाटन हुआ ।।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि ब्रह्मा के शरीर से एक सर्वाङ्ग सुन्दर तरुणी उत्पन्न हुई, यह उनके अंग से उत्पन्न होने के कारण उनकी पुत्री हुई ।।
इस तरुणी की सहायता से उन्होंने अपना सृष्टि निर्माण कार्य जारी रखा ।। इसके पश्चात् उस अकेली रूपवती युवती को देखकर उनका मन विचलित हो गया और उन्होंने उससे पत्नी के रूप में रमण किया ।। इस मैथुन से मैथुनी संयोगज- परमाशुमवी भौतिक सृष्टि उत्पन्न हुई ।।
इस कथा के आलंकारिक रूप को, रहस्यमय पहेली को न समझा कर कई व्यक्ति अपने मन में प्राचीन तथ्यों को उथली और अश्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं ।।
वे यह भूल जाते हैं कि ब्रह्मा कोई मनुष्य नहीं हैं और न उससे उत्पन्न हुई शक्ति पुत्री या स्त्री है और न पुरुष स्त्री की तरह उनके बीच में समागम होता है ।। यह तो सृष्टि निर्माण काल के तथ्य को गूढ़ पहेली के रूप में आलंकारिक ढंग से प्रस्तुत करके कवि ने अपनी कलाकारिता का परिचय दिया है ।।
ब्रह्मा, निर्विकार परमात्मा की वह शक्ति है जो सृष्टि का निर्माण करती है ।। इस निर्माण कार्य को चलाए रखने के लिए उसकी तथा परमाणु शक्ति कहते हैं ।। संकल्प शक्ति, सतोगुण सम्भव है, उच्च आत्मिक तत्वों से सम्पन्न है इसलिए उसे सुकोमल, शिशु सी पवित्र पुत्री कहा है ।। यही पुत्री गायत्री है ।। अब इस दिशा में कार्य हो चुका ।।
चैतन्य तत्वों को निर्माण हो चुका तो ब्रह्मा जी ने अपनी निर्माण शक्ति की सहायता से मैथुनी सृष्टि को संयोगज परमाणु प्रक्रिया को, आरम्भ कर दिया, तब वह स्त्री के रूप में पत्नी के रूप में कही गई तब उसका नाम सावित्री हुआ इस प्रकार गायत्री और सावित्री पुत्री तथा पत्नी के नाम प्रसिद्ध हुई ।।
(गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन पृ. 1.18)

| गायत्री महाविद्या ||


गायत्री साधना सदबुद्धि की आराधना- उपासना है ।। “गौ” को वेदों की माता- वेदमाता कहा जाता है ।। वेद शब्द का अर्थ है ”ज्ञान” ।। यह ज्ञान कल्याण (ऋक् ), पौरुष (यजु), क्रीड़ा (साम) एवं अर्थ (अथर्वण)- इन चार उपक्रमों के माध्यम से सृष्टि के हर जीवधारी के चेतनात्मक क्रिया कलापों का मूलाधार हैं उस चैतन्य शक्ति की जिसे आद्य शक्ति कहा जाता है, यह स्फुरणा है जो सृष्टि के आरंभ में उद्भूत हुई व इस सृष्टि की उत्पत्ति इस प्रकार से ब्रह्माजी के माध्यम से चार वेदों के माध्यम से हुई ।।
गायत्री वही आद्य शक्ति है, इसलिए वेदमाता कही जाती है ।। गायत्री मंत्र को समस्त वेद शास्त्रों का निचोड़’ कहा गया है ।। शास्त्रों में ऋषिगणों ने इस मंत्र की महिमा का गायन खुलकर किया है तथा श्रीमद्भगवद्गीता में तो स्पष्ट रूप से योगिराज श्रीकृष्ण के मुख से कहलवाया गया है कि गायत्री छन्दों में सर्वश्रेष्ठ होने के रूप में परमात्मा की सत्ता उनमें विराजती है ।
।। ” गायत्री छन्द सामहम्” ।।
गायत्री मंत्र एक छोटा सा सारगर्भित किन्तु समग्र धर्म शास्त्र है जिसके चौबीस अक्षरों में से प्रत्येक अक्षर में वेदों रूपी महा वट- वृक्ष के मूल तत्त्व ज्ञानबीज के रूप में विद्यमान हैं ।। इन्हीं के पल्लवित होने पर वैदिक वाङ्मय का अपौरुषेय कहलाने वाला चारों वेदों का विस्तार ऋषियों की ज्ञान सम्पदा के रूप में हमारे समक्ष आता है जो सृष्टि की उत्पत्ति का आधार ही नहीं बना, देव संस्कृति का उद्गम भी कहलाया ।।
जिससे प्रमाणित होता है कि इस एक मंत्र के माध्यम से ही इस संसार में सब कुछ पाया जा सकता है ।। कैसे गायत्री देवताओं, अवतारी सत्ताओं व ऋषिगणों की उपास्य रही है, मानव मात्र के लिए वह विपत्ति निवारण करने वाली एक संजीवनी किस रूप में है ।।
गायत्री अमृत है, पारस है, कल्पवृक्ष है, कामधेनु है, किस रूप में व किस तरह वह सुपात्र को ये अनुदान प्रदान करती है, इसकी विवेचना जो गायत्री महा विज्ञान, युग शक्ति गायत्री एवं अखण्ड ज्योति में समय- समय पर प्रकाशित होती रहती है ।। गायत्री महामंत्र का हर अक्षर शक्ति का स्रोत है, अपरिमित शक्ति का भाण्डागार है तथा सही ढंग से की गयी गायत्री उपासना जीवन में चमत्कारिक परिणाम उत्पन्न करती है, यह परमपूज्य गुरुदेव के जीवन का अनुभव है जो इन पंक्तियों को पढ़कर आत्मसात् किया व स्वयं जीवन में कैसे उतारा जाय, यह शिक्षण लिया जा सकता है ।।
गायत्री महाविद्या को अथर्ववेद के अनुसार प्रधानतया ब्रह्मवर्चस् अर्थात् आत्मबल प्रदान करने वाली प्रधान सत्ता बताते हुए परमपूज्य गुरुदेव ने इसे प्राण ऊर्जा की अधिष्ठात्री शक्ति प्रमाणित किया है ।।
आज का सबसे बड़ा संकट है आत्मबल की कमी, मानव की अशक्ति ।। आस्था संकट से पीड़ित मानव जाति को जिस संजीवनी- जीवन मन्त्र की आवश्यकता है, वह गायत्री महामंत्र के रूप में विद्यमान है ।। यदि व्यक्ति इस मंत्र की उपासना के माध्यम से अपना ब्रह्मवर्चस् जगा ले, अपने प्रसुप्त बल को पुनः प्राप्त कर ले तो वह समस्त प्रतिकूलताओं से मोर्चा ले सकता है ।।
श्रद्धा, निष्ठा, प्रज्ञारूपी त्रिपदा गायत्री की उपासना साधक को ऐसा ही आत्मबल प्रदान करती है, जिससे वह दुर्भावनाओं, दुश्चिन्तन दुष्प्रवृत्तियों से जूझते हुए जीवन समर जीतता हुआ आगे बढ़ता रहा सकता है ।। अपना आध्यात्मिक स्वास्थ्य बनाए रख अपना आभा मण्डल सतत बढ़ाए रखता चल सकता है ।।
अपनी बुद्धि को सन्मार्ग- गामी बनाते हुए स्रष्ट के इस उद्यान को और सुरम्य बना सकता है ।। परा व अपरा विद्या की जननी गायत्री महामंत्र के जितने भी ज्ञात- अविज्ञात पक्ष हैं, उनको जन- जन के समक्ष प्रस्तुत कर एक प्रकार से समग्र मानव जाति का कायाकल्प करने, नूतन सृष्टि का सृजन करने का पुरुषार्थ इस ज्ञान के माध्यम से सम्पन्न हुआ है ।।
गायत्री उपासना ईश्वर उपासना का एक अत्युत्तम, सरलतम, शीघ्र सफलता देने वाला मार्ग है, यह जानने के बाद फिर कहीं किसी को भटकने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती ‘गायत्री वा इदं सर्वभूत़ं यदिदं किंच’ के माध्यम से छान्दोग्योपनिषद्कार ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि यह विश्व जो भी कुछ है, गायत्रीमय है।

मह र्षि भारद्वाज रचित ‘विमान शास्त्र‘ 5


4. यन्त्र सर्वस्वः –
यह ग्रन्थ भी ऋषि भारदूज रचित है। इस के 40 भाग हैं जिन में से एक भाग ‘विमानिका प्रकरण’के आठ अध्याय, लगभग 100 विषय और 500 सूत्र हैं जिन में विमान विज्ञान का उल्लेख है। इस ग्रन्थ में ऋषि भारदूजने विमानों को तीन श्रेऩियों में विभाजित किया हैः-
1. अन्तरदेशीय – जो ऐक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।
2. अन्तरराष्ट्रीय – जो ऐक देश से दूसरे देश को जाते
3. अन्तीर्क्षय – जो ऐक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाते
इन में सें अति-उल्लेखलीय सैनिक विमान थे जिन की विशेषतायें विस्तार पूर्वक लिखी गयी हैं और वह अति-आधुनिक साईंस फिक्शन लेखक को भी आश्चर्य चकित कर सकती हैं। उदाहरणार्थ सैनिक विमानों की विशेषतायें इस प्रकार की थीं-
पूर्णत्या अटूट, अग्नि से पूर्णत्या सुरक्षित, तथा आवश्यक्ता पडने पर पलक झपकने मात्र समय के अन्दर ही एकदम से स्थिर हो जाने में सक्षम।
1-शत्रु से अदृष्य हो जाने की क्षमता।
2-शत्रुओं के विमानों में होने वाले वार्तालाप तथा अन्य ध्वनियों को सुनने में सक्ष्म। शत्रु के विमान के भीतर से आने वाली आवाजों को तथा वहाँ के दृष्यों को रिकार्ड कर लेने की क्षमता।
3-शत्रु के विमान की दिशा तथा दशा का अनुमान लगाना और उस पर निगरानी रखना।
4-शत्रु के विमान के चालकों तथा यात्रियों को दीर्घ काल के लिये स्तब्द्ध कर देने की क्षमता।
5-निजि रुकावटों तथा स्तब्द्धता की दशा से उबरने की क्षमता।
6-आवश्यक्ता पडने पर स्वयं को नष्ट कर सकने की क्षमता।
7-चालकों तथा यात्रियों में मौसमानुसार अपने आप को बदल लेने की क्षमता।
8-स्वचालित तापमान नियन्त्रण करने की क्षमता।
9-हल्के तथा उष्णता ग्रहण कर सकने वाले धातुओं से निर्मित तथा आपने आकार को छोटा बडा करने, तथा अपने चलने की आवाजों को पूर्णत्या नियन्त्रित कर सकने में सक्ष्म।
विचार करने योग्य तथ्य है कि इस प्रकार का विमान अमेरिका के अति आधुनिक स्टेल्थ फाईटर और उडन तशतरी का मिश्रण ही हो सकता है।
ऋषि भारद्वाज कोई आधुनिक ‘फिक्शन राईटर’ नहीं थे परन्तु ऐसे विमान की परिकल्पना करना ही आधुनिक बुद्धिजीवियों को चकित कर सकता है कि भारत के ऋषियों ने इस प्रकार के वैज्ञिानक माडल का विचार कैसे किया।
उन्होंने अंतरीक्ष जगत और अति-आधुनिक विमानों के बारे में लिखा जब कि विश्व के अन्य देश साधारण खेती बाडी का ज्ञान भी पूर्णत्या हासिल नहीं कर पाये थे।
5. समरांगनः सुत्रधारा –
य़ह ग्रन्थ विमानों तथा उन से सम्बन्धित सभी विषयों के बारे में जानकारी देता है।इस के 230 पद्य विमानों के निर्माण, उडान, गति, सामान्य तथा आकस्माक उतरान एवम पक्षियों की दुर्घटनाओं के बारे में भी उल्लेख करते हैं।
लगभग सभी वैदिक ग्रन्थों में विमानों की बनावट त्रिभुज आकार की दिखायी गयी है। किन्तु इन ग्रन्थों में दिया गया आकार प्रकार पूर्णत्या स्पष्ट और सूक्ष्म है। कठिनाई केवल धातुओं को पहचानने में आती है।
समरांगनः
सुत्रधारा के आनुसार सर्व प्रथम पाँच प्रकार के विमानों का निर्माण ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर तथा इन्द्र के लिये किया गया था। पश्चात अतिरिक्त विमान बनाये गये। चार मुख्य श्रेणियों का ब्योरा इस प्रकार हैः-
रुकमा – रुकमानौकीले आकार के और स्वर्ण रंग के थे।
सुन्दरः –सुन्दर राकेट की शक्ल तथा रजत युक्त थे।
त्रिपुरः –त्रिपुर तीन तल वाले थे।
शकुनः – शकुनः का आकार पक्षी के जैसा था।
दस अध्याय संलगित विषयों पर लिखे गये हैं जैसे कि विमान चालकों का परिशिक्षण, उडान के मार्ग, विमानों के कल-पुरज़े, उपकरण, चालकों एवम यात्रियों के परिधान तथा लम्बी विमान यात्रा के समय भोजन किस प्रकार का होना चाहिये।
ग्रन्थ में धातुओं को साफ करने की विधि, उस के लिये प्रयोग करने वाले द्रव्य, अम्ल जैसे कि नींबु अथवा सेब या कोई अन्य रसायन, विमान में प्रयोग किये जाने वाले तेल तथा तापमान आदि के विषयों पर भी लिखा गया है।
सात प्रकार के ईजनों का वर्णन किया गया है तथा उन का किस विशिष्ट उद्देष्य के लिये प्रयोग करना चाहिये तथा कितनी ऊचाई पर उस का प्रयोग सफल और उत्तम होगा। सारांश यह कि प्रत्येक विषय पर तकनीकी और प्रयोगात्मक जानकारी उपलब्द्ध है। विमान आधुनिक हेलीकोपटरों की तरह सीधे ऊची उडान भरने तथा उतरने के लिये, आगे पीछ तथा तिरछा चलने में भी सक्ष्म बताये गये हैं।
6. कथा सरित-सागर –
यह ग्रन्थ उच्च कोटि के श्रमिकों का उल्लेख करता है जैसे कि काष्ठ का काम करने वाले जिन्हें राज्यधर और प्राणधर कहा जाता था। यह समुद्र पार करने के लिये भी रथों का निर्माण करते थे तथा एक सहस्त्र यात्रियों को ले कर उडने वालो विमानों को बना सकते थे। यह रथ-विमान मन की गति के समान चलते थे।
कोटिल्य के अर्थ शास्त्र में अन्य कारीगरों के अतिरिक्त सोविकाओं का उल्लेख है जो विमानों को आकाश में उडाते थे । कोटिल्य ने उन के लिये विशिष्ट शब्द आकाश युद्धिनाह का प्रयोग किया है जिस का अर्थ है आकाश में युद्ध करने वाला (फाईटर-पायलेट) आकाश रथ, चाहे वह किसी भी आकार के हों का उल्लेख सम्राट अशोक के आलेखों में भी किया गया है जो उस के काल 256-237 ईसा पूर्व में लगाये गये थे।
विमान शास्त्र का भारतीय इतिहास___
इस ग्रंथ में भरद्वाज मुनि ने विमान का पायलट, जिसे रहस्यज्ञ अधिकारी कहा गया, आकाश मार्ग, वैमानिक के कपड़े, विमान के पुर्जे, ऊर्जा, यंत्र तथा उन्हें बनाने हेतु विभिन्न धातुओं का वर्णन किया है।
रहस्यज्ञ अधिकारी (घ्त्थ्दृद्य)-भरद्वाज मुनि कहते हैं, विमान के रहस्यों को जानने वाला ही उसे चलाने का अधिकारी है। शास्त्रों में विमान चलाने के बत्तीस रहस्य बताए गए हैं। उनका भलीभांति ज्ञान रखने वाला ही सफल चालक हो सकता है ! इन बत्तीस रहस्यों में कुछ प्रमुख रहस्य निम्न प्रकार हैं।
(३) कृतक रहस्य-
(५) गूढ़ रहस्य-
(९) अपरोक्ष रहस्य-
(१०) संकोचा-
(११) विस्तृता-
(२२) सर्पागमन रहस्य-
(२५) परशब्द ग्राहक रहस्य-
(२६) रूपाकर्षण रहस्य-
(२८) दिक्प्रदर्शन रहस्य-
(३१) स्तब्धक रहस्य-
(३२) कर्षण रहस्य-
(१) विश्व क्रिया दर्पण-इस यंत्र के द्वारा विमान के आस-पास चलने वाली गति-विधियों का दर्शन वैमानिक को विमान के अंदर होता था, इसे बनाने में अभ्रक तथा पारा आदि का प्रयोग होता था।
(२) परिवेष क्रिया यंत्र- इसमें स्वचालित यंत्र वैमानिक का वर्णन है।
(३) शब्दाकर्षण यंत्र- इस यंत्र के द्वारा २६ कि.मी. क्षेत्र की आवाज सुनी जा सकती थी तथा पक्षियों की आवाज आदि सुनने से विमान को दुर्घटना से बचाया जा सकता था।
(४) गुह गर्भ यंत्र-इस यंत्र के द्वारा जमीन के अन्दर विस्फोटक खोजने में सफलता मिलती थी।
(५) शक्त्याकर्षण यंत्र- विषैली किरणों को आकर्षित कर उन्हें उष्णता में परिवर्तित करना और वह उष्णता वातावरण में छोड़ना।
(६) दिशा दर्शी यंत्र- दिशा दिखाने वाला यंत्र।
(७) वक्र प्रसारण यंत्र-इस यंत्र के द्वारा शत्रु विमान अचानक सामने आ गया तो उसी समय पीछे मुड़ना संभव होता था।
(८) अपस्मार यंत्र- युद्ध के समय इस यंत्र से विषैली गैस छोड़ी जाती थी।
(९) तमोगर्भ यंत्र-इस यंत्र के द्वारा युद्ध के समय विमान को छिपाना संभव था। इनके निर्माण में तमोगर्भ लौह प्रमुख घटक रहता था।
(१०) उर्जा स्रोत- विमान को चलाने के लिए चार प्रकार के ऊर्जा स्रोतों का महर्षि भारद्वाज उल्लेख करते हैं।
(१) उर्जा स्रोत- विमान को चलाने के लिए चार प्रकार के ऊर्जा स्रोतों का महर्षि भारद्वाज उल्लेख करते हैं।
वनस्पति तेल, जो पेट्रोल की भांति काम करता है।
(२) पारे की भाप-- प्राचीन शास्त्रों में इसका शक्ति के रूप में उपयोग किये जाने का वर्णन है। इसके द्वारा अमरीका में विमान उड़ाने का प्रयोग हुआ, पर वह ऊपर गया, तब विस्फोट हो गया। परन्तु यह तो सिद्ध हुआ कि पारे की भाप का ऊर्जा के रूप में उपयोग किया जा सकता है। आवश्यकता अधिक निर्दोष प्रयोग करने
(३) सौर ऊर्जा-इसके द्वारा भी विमान चलता था।
(४) वातावरण की ऊर्जा- बिना किसी अन्य साधन के सीधे वातावरण से शक्ति ग्रहण कर विमान, उड़ना जैसे समुद्र में पाल खोलने पर नाव हवा के सहारे तैरती है उसी प्रकार अंतरिक्ष में विमान वातावरण से शक्ति ग्रहण कर चलता रहेगा। अमरीका में इस दिशा में प्रयत्न चल रहे हैं। यह वर्णन बताता है कि ऊर्जा स्रोत के रूप में प्राचीन भारत में कितना व्यापक विचार हुआ था।
विमान के प्रकार-
विमान विद्या के पूर्व आचार्य युग के अनुसार विमानों का वर्णन करते है।
सतयुग और त्रेता युगमंत्रिका प्रकार के विमान, जिसमें भौतिक एवं मानसिक शक्तियों के सम्मिश्रण की प्रक्रिया रहती थी। इसमें २५ प्रकार के विमान का उल्लेख है।
द्वापर युग में तांत्रिका प्रकार के विमान थे। इनके ५६ प्रकार बताये गए हैं ।
कलियुग में कृतिका प्रकार के यंत्र चालित विमान थे, इनके २५ प्रकार बताये गए हैं। इनमें शकुन, रूक्म, हंस, पुष्कर, त्रिपुर आदि प्रमुख थे।