Wednesday, 29 June 2016

शिव की तीसरी आंख



पुराणों में भगवान शिव एक ऐसे देवता के रूप में उल्लेखित हैं जिनकी अराधाना देवता, दानव और मानव सब करते हैं. मिथकों में शिव की जो छवि पेश की जाती है उसमें एक तरफ तो वे सुखी दांपत्य जीवन जीते हैं तो दूसरी तरफ कैलाश पर्वत पर तपस्यारत कैलाश की ही तरह निश्चल योगी की. पर शिव की छवि की सबसे विचित्र बात उनके माथे पर तीसरी आंख का होना है. आखिर शिव के माथे पर तीसरी आंख के होने का क्या निहितार्थ हैं? दरअसल शिव की तीसरी आंख कोई अतरिक्त अंग नहीं है बल्कि यह प्रतिक है उस दृष्टि की जो आत्मज्ञान के लिए आवश्यक है. शिव जैसे परम योगी के पास यह दृष्टि होना बिलकुल भी अचरज की बात नहीं है.

क्यों जरूरी है तीसरी आंख?
संसार को देखने के लिए दो आंखे प्रयाप्त है जो हर किसी के पास उपलब्ध है पर संसार और संसारिकता से पर देखने के लिए तीसरी आंख का होना आवश्यक है और वह शिव जैसे योगी के पास ही हो सकती है. अर्थ यह है कि तीसरी आंख बाहर नहीं अपने भीतर देखने के लिए है. तीसरी आंख प्रतीक है बुद्धिमत्ता का- शुद्ध, विवेकशील प्रज्ञा का.

हर-हर महादेव का अर्थ
सबसे पुराने वेद ऋग्वेद का सारतत्व है ‘प्रज्ञानाम ब्रह्म’ अर्थात ब्रह्म ही परम चेतना है. वहीं अथर्वेद कहता है ‘अयम आत्म ब्रह्मा’ अर्थात यह आत्म ही ब्रह्म है. सामवेद का कथन है ‘तत्वमसि’ अर्थात वह तुम हो जबकि यजुर्वेद का सार है ‘अहम ब्रहास्मि’ अर्थात मैं ब्रह्म हूं.शिव उसी परम ब्रह्म के प्रतीक हैं. शिव का अराधक ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष करता है. जानकार बताते हैं कि ‘हर-हर महादेव’ का अर्थ है हर किसी में महादेव अर्थात शिव हैं. संस्कृत में ‘हर’ का अर्थ नष्ट करना भी होता है यानी ‘हर- हर महादेव’ का एक अर्थ यह भी हुआ कि शिव का अराधक शिव की तरह ही अपने भीतर के सारे दोषों को नष्ट करते हुए परम चेतना को प्राप्त करने का प्रयत्न करे. ऐसा ज्ञान चक्षु यानी तीसरी आंख के खुलने पर ही संभव है.
साधारण भक्त ईश्वर को खुद से अलग समझता है. वह कर्मकांड के माध्यम से ईश्वर को प्रसन्न कर अपने लिए संसारिक सुखों की अपेक्षा करता है पर ज्ञानी भक्त अपने आराध्य में अपना आदर्श देखता है. उसकी आराधना का लक्ष्य अध्यात्मिक उत्थान होता है. वेदों के अनुसार भी उपासना का यही लक्ष्य होना चाहिए.

क्या सचमुच शिव ने कामदेव को भष्म किया था?🌿
शिव की तीसरी आंख के संदर्भ में जिस एक कथा का सर्वाधिक जिक्र होता है वह है कामदेव को शिव द्वारा अपनी तीसरी आंख से भष्म कर देने की कथा. कामदेव यानी प्रणय के देवता ने पापवृत्ति द्वारा भगवान शिव को लुभाने और प्रभावित करने की कोशिश कर रहा था. शिव ने अपनी तीसरी आंख खोली और उससे निकली दिव्य अग्नी से कामदेव जल कर भष्म हो गया. सच्चाई यह है कि यह कथा प्रतिकात्मक है जो यह दर्शाती है कि कामदेव हर मनुष्य के भीतर वास करता है पर यदि मनुष्य का विवेक और प्रज्ञा जागृत हो तो वह अपने भीतर उठ रहे अवांछित काम के उत्तेजना को रोक सकता है और उसे नष्ट कर सकता हैं.

🌿 भक्त भी पा सकते हैं शिव के भांति तीसरी आंख🌿
भारतीय संस्कृति में अनेक देवताओं का वर्णन मिलता है. हर देवता का चरित्र, रंग-रूप और वेश-भूषा एक दूसरे से भिन्न. यहां एक उपासक के पास यह सुविधा है कि वह अपने व्यक्तिगत पसंद और क्षमता के अनुसार उस देवता का चुनाव करे जिनका चरित्र उसे सर्वाधिक आकर्षित करता है और जिसे वह आत्मसात करना चाहता है. दरअसल संस्कृत शब्द ‘उपासना’ का अर्थ ही है ‘पास बैठना’ यानी अपने आराध्य के निकट से निकट पहुंचना. इस रूप में देखा जाए तो शिव की तीसरी आंख उनके उपासकों के लिए आमंत्रण है कि वे भी अपनी तीसरी आंख यानी आत्मज्ञान को प्राप्त करे.

महाभारत का कारण



एक समय राजाधिराज युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित श्रीकृष्ण के साथ मयदानव द्वारा बनाई सभा में स्वर्ण सिंहासन पर देवराज इन्द्र के समान विराजमान थे। मयदानव निर्मित भवन में दुर्योधन को जल-स्थल का भान नहीं हुआ और दुर्योधन गिर पड़े। इस पर भीम ने हास्य-व्यंग्य किया जिससे की दुर्योधन ने अपमानित महसूस किया। इस प्रसंग पर लोग कहते हैं कि दुर्योधन को गिरते हुए देखकर द्रौपदी ने कहा कि "अंधे के पुत्र अंधे होते है।" ऐसा कहना ठीक नहीं। शास्त्रीय आधार पर भी ऐसा कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता कि द्रौपदी ने ऐसा अपशब्द बोला हो। वहां उस प्रसंग में द्रौपदी थी ही नहीं, तो बोली कैसे ? दूसरी बात द्रौपदी जैसी दया की देवी, ऐसा अपशब्द कैसे बोलती? जो भागवत में कहती है कि मुझे जो दु:ख मिला वैसा दु:ख किसी को भी ना मिले। द्रौपदी के चरित्र के साथ हमें न्याय करना चाहिए। उस प्रसंग में तो भीम थे। भीम हंसे, किंतु ऐसे अपशब्दो का प्रयोग नहीं किया। महाभारत में स्पष्ट है कि

                   भूमौ निपतितं दृष्द्वा भीमसेनो महाबल:।
                   जहास जहसुश्चैव किंकराश्च सुयोधनम।।

फलत: महाभारत जैसा धर्म युद्ध हुआ। महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने पग-पग पर पाण्डवों की रक्षा की और कौरवों का संहार हुआ।

द्रौपदी के जन्म की कथा



महाभारत ग्रंथ के अनुसार एक बार राजा द्रुपद ने कौरवो और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य का अपमान कर दिया था। गुरु द्रोणाचार्य इस अपमान को भूल नहीं पाए। इसलिए जब पाण्डवों और कौरवों ने शिक्षा समाप्ति के पश्चात गुरु द्रोणाचार्य से गुरु दक्षिणा माँगने को कहा तो उन्होंने उनसे गुरु दक्षिणा में राजा द्रुपद को बंदी बनाकर अपने समक्ष प्रस्तुत करने को कहा। पहले कौरव राजा द्रुपद को बंदी बनाने गए पर वो द्रुपद से हार गए। कौरवों के पराजित होने के बाद पांडव गए और उन्होंने द्रुपद को बंदी बनाकर द्रोणाचार्य के समक्ष प्रस्तुत किया। द्रोणाचार्य ने अपने अपमान का बदला लेते हुए द्रुपद का आधा राज्य स्वयं के पास रख लिया और शेष राज्य द्रुपद को देकर उसे रिहा कर दिया।
गुरु द्रोण से पराजित होने के उपरान्त महाराज द्रुपद अत्यन्त लज्जित हुये और उन्हें किसी प्रकार से नीचा दिखाने का उपाय सोचने लगे। इसी चिन्ता में एक बार वे घूमते हुये कल्याणी नगरी के ब्राह्मणों की बस्ती में जा पहुँचे। वहाँ उनकी भेंट याज तथा उपयाज नामक महान कर्मकाण्डी ब्राह्मण भाइयों से हुई। राजा द्रुपद ने उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न कर लिया एवं उनसे द्रोणाचार्य के मारने का उपाय पूछा। उनके पूछने पर बड़े भाई याज ने कहा, “इसके लिये आप एक विशाल यज्ञ का आयोजन करके अग्निदेव को प्रसन्न कीजिये जिससे कि वे आपको महान बलशाली पुत्र का वरदान दे देंगे।” महाराज ने याज और उपयाज से उनके कहे अनुसार यज्ञ करवाया। उनके यज्ञ से प्रसन्न हो कर अग्निदेव ने उन्हें एक ऐसा पुत्र दिया जो सम्पूर्ण आयुध एवं कवच कुण्डल से युक्त था। उसके पश्चात् उस यज्ञ कुण्ड से एक कन्या उत्पन्न हुई जिसके नेत्र खिले हुये कमल के समान थे, भौहें चन्द्रमा के समान वक्र थीं तथा उसका वर्ण श्यामल था। उसके उत्पन्न होते ही एक आकाशवाणी हुई कि इस बालिका का जन्म क्षत्रियों के संहार और कौरवों के विनाश के हेतु हुआ है। बालक का नाम धृष्टद्युम्न एवं बालिका का नाम कृष्णा रखा गया जो की राजा द्रुपद की बेटी होने के कारण द्रौपदी कहलाई।

Monday, 27 June 2016

भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार



मत्स्य पुराण में उल्ले‍ख है कि सत्यव्रत नाम के राजा एक दिन कृतमाला नदी में जल से तर्पण कर रहे थे। उस समय उनकी अंजुलि में एक छोटी सी मछली आ गई। सत्यव्रत ने मछली को नदी में डाल दिया तो मछली ने कहा कि इस जल में बड़े जीव-जंतु मुझे खा जाएंगे। यह सुनकर राजा ने मछली को फिर जल से निकाल लिया और अपने कमंडल में रख लिया और आश्रम ले आए।
रातभर में वह मछली बढ़ गई। तब राजा ने उसे बड़े मटके में डाल दिया। मटके में भी वह बढ़ गई तो उसे तालाब में डाल दिया। और तब अंत में सत्यव्रत ने जान लिया कि यह कोई मामूली मछली नहीं है, जरूर इसमें कुछ बात है, तब उन्होंने उसे ले जाकर समुद्र में डाल दिया। समुद्र में डालते समय मछली ने कहा कि समुद्र में मगर रहते हैं मुझे वहां मत छोड़िए, लेकिन राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि आप मुझे कोई मामूली मछली नहीं जान पड़ती है। आपका आकार तो अप्रत्याशित तेजी से बढ़ रहा है। बताएं कि आप कौन हैं?
तब मछली रूप में भगवान विष्णु ने प्रकट होकर कहा कि आज से 7वें दिन प्रलय  के कारण पृथ्वी समुद्र में डूब जाएगी, तब मेरी प्रेरणा से तुम एक बहुत बड़ी नौका बनाओ और जब प्रलय शुरू हो तो तुम सप्त ऋषियों सहित सभी प्राणियों को लेकर उस नौका में बैठ जाना तथा सभी अनाज उसी में रख लेना। अन्य छोटे-बड़े बीज भी रख लेना। नाव पर बैठकर लहराते महासागर में विचरण करना। प्रचंड आंधी के कारण नौका डगमगा जाएगी, तब मैं इसी रूप में आ जाऊंगा। तब वासुकि नाग द्वारा उस नाव को मेरे सींग में बांध लेना। जब तक ब्रह्मा की रात रहेगी, मैं नाव समुद्र में खींचता रहूंगा। उस समय जो तुम प्रश्न करोगे मैं उत्तर दूंगा। इतना कह मछली गायब हो गई।
राजा तपस्या करने लगे। मछली का बताया हुआ समय आ गया। वर्षा होने लगी। समुद्र उमड़ने लगा। तभी राजा ऋषियों, अन्न, बीजों को लेकर नौका में बैठ गए। और फिर भगवानरूपी वही मछली दिखाई दी। उसके सींग में नाव बांध दी गई और मछली से पृथ्वी और जीवों को बचाने की स्तुति करने लगे। मछलीरूपी विष्णु ने उसे आत्मतत्व का उपदेश दिया। मछलीरूपी विष्णु ने अंत में नौका को हिमालय की चोटी से बांध दिया। नाव में ही बैठे-बैठे प्रलय का अंत हो गया।
यही सत्यव्रत वर्तमान में महाकल्प में विवस्वान या वैवस्वत (सूर्य) के पुत्र श्राद्धदेव के नाम से विख्यात हुए, वही वैवस्वत मनु के नाम से भी जाने गए।

छ अविद्या का ब्रह्मवैवर्त पुराण में निराकरण-



-#शिव तमोगुणी हैं।

जो इंसान शिव को तमोगुणी समझता है वो अधम पातक है। ब्रह्मा रजोगुणी हैं, लेकिन शिव और #विष्णु समान रूप से सतोगुण के आश्रय हैं।

-शिव संहार करते हैं।

शिव संहार नहीं करते बल्कि शिव के एक अंश कालाग्नि संसार का संहार करता है। जो सत्वगुण शिव हैं वही संसार का कल्याण करते हैं बाकी के रूद्र तो केवल कृष्ण की कला का अवतार हैं।

-सरस्वती ब्रह्मा की पुत्री और पत्नी हैं।

#सरस्वती ब्रह्मा की नहीं, भगवान् विष्णु की पत्नी हैं और ब्रह्मा की पूज्य देवी हैं। सरस्वती की पूजा के फल से ही ब्रह्मा को गायत्री प्राप्त हुई थी और वो वेदों को जान सके थे। इसलिए सरस्वती ब्रह्मा की माता समान हैं।

Sunday, 26 June 2016

एक कभी न खत्म होने वाली कहानी

 ...पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ,
..आँसू छिपाते हो फेर कर नज़रे,
..इतना फीका मुस्कुराया न करो ..पापा मुझे छोड़ने आया न करो
... हिदायत से घर भर की लाइट्स बुझाते ,
... सोच कर भी न कितने सामान खरीदते ,
...गाड़ी का माइलेज चेक करते रहते ,
...मेरे हाथ में ए टी एम थमाया न करो ... पापा मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो ।
...पानी की बॉटल रखी या नही,
...टिकट कही भूली तो नही ,
...पर्स में खुले पैसे रखे या नही
..इतना नम प्यार जताया न करो ....पापा मुझे छोड़ने आया न करो ।
सीट के नीचे बैग जमाते ,
ध्यान रखना अकेली जा रही,
साथ की किसी महिला को बताते,
पल पल इतनी चिंता जताया न करो ...पापा मुझे छोड़ने आया न करो ।
पहुँचते ही कर देना फोन ,
अब कब होगा आना फिर तुम्हारा ,
रग रग कर देते हो तन्हा ,
उदासी से सर पर हाथ फिराया न करो ..आप स्टेशन आया न करो ।
मैं खामोश रीती हो जाती ,
जी भर ऐसे गले लगाया न करो ,
दूर तक देखती रह जाती हूँ बिखर कर,
ग़मगीन खड़े यू हाथ हिलाया न करो ,.. .....आप स्टेशन आया न करो ।
चप्पा चप्पा कर देते हो वीरान ,
रुन्धा गला बेमतलब बातो में छिपाया न करो,
मेरा आगा पीछा सोच सोच ,
अपना कलेजा दुखाया न करो,...... मुझे छोड़ने स्टेशन आया न करो
लो बात करो कह फ़ोन माँ को थमा ,
बाद में पूछते उनसे ब्यौरा सारा ,
बरसो पुराना मोबाइल रखे ,
हमारे नाम पाई पाई के कागज़ बनवाया न करो.... आप स्टेशन न आया पापा

मीरा चरित(24)

॥जय गौर हरि ॥
मीरा चरित(24)
क्रमशः से आगे...........
भोजराज श्याम कुन्ज से प्रतिज्ञा कर अपने डेरे लौट आये ।वहाँ आकर कटे वृक्ष की भाँति पलंग पर जा पड़े ।पर चैन नहीं पड़ रहा था ।कमर में बंधी कटार चुभी , तो म्यान से बाहर निकाल धार देखते हुये अनायास ही अपने वक्ष पर तान ली ....... ।
एक क्षण........ में ही लगा जैसे बिजली चमकी हो ।अंतर में मीरा आ खड़ी हुईं ।उदास मुख , कमल- पत्र पर ठहरे ओस-कण से आँसू गालों पर चमक रहे है ।जलहीन मत्स्या (मछली ) सी आकुल दृष्टि मानो कह रही हो - आप ऐसा करेंगे -तो मेरा क्या होगा ?
भोजराज ने तड़पकर कटार दूर फैंक दी ।मेवाड़ का उत्तराधिकारी , लाखों वीरों का अग्रणी, जिसका नाम सुनकर ही शत्रुओं के प्राण सूख जाते है और दीन -दुखी श्रद्धा से जयजयकार कर उठते है ,जिसे देख माँ की आँखों में सौ- सौ सपने तैर उठते है ......वही मेदपाट का भावी नायक आज घायल शूर की भाँति धरा पर पड़ा है ।आशा -अभिलाषा और यौवन की मानों अर्थी उठ गई हो ।उनका धीर -वीर ह्रदय प्रेम पीड़ा से कराह उठा ।उन्हें इस दुख में भाग बाँटने वाला कोई दिखाई नहीं देता ।उनके कानों में मीरा की गिरधर को करूण पुकार .......
🌿म्हाँरा सेठ बोहरा , ब्याज मूल काँई जोड़ो।
गिरधर लाल प्रीति मति तोड़ो ॥🌿
गूँज रही है...... ।
"हाय ! कैसा दुर्भाग्य है इस अभागे मन का ? कहाँ जा लगा यह ? ज�हाँ इसकी रत्ती भर भी परवाह नहीं ।पाँव तले रूँदने का भाग्य लिखाकर आया बदनसीब ! "
"मीरा..... कितना मीठा नाम है यह, जैसे अमृत से सिंचित हो ।अच्छा इसका अर्थ क्या है भला ?किससे पूछुँ?" "अब तो ..... उन्हीं से पूछना होगा ।उनके .......चित्तौड़ आने पर ।" उनके होंठों पर मुस्कान , ह्रदय में विद्युत तरंग थिरक गई ।वे मीरा से मानों प्रत्यक्ष बात करने लगे -" मुझे केवल तुम्हारे दर्शन का अधिकार चाहिए ......तुम प्रसन्न रहो.......तुमहारी सेवा का सुख पाकर यह भोज निहाल हो जायेगा ।मुझे और कुछ नहीं चाहिए ...... कुछ भी नहीं ।"
अगले दिन ही भोजराज ने गिरिजा बुआ से और वीरमदेव जी से घर जाने की आज्ञा माँगी ।गिरिजा जी ने भतीजे का मुख थोड़ा मलिन देख पूछा तो भोजराज ने हँस कर बात टाल दी ।हाँलाकि वे मेड़ता में सबका सम्मान करते पर अब उनका यहां मन न लग रहा था ।
भोजराज चित्तौड़ आ गये पर उनका मन अब यहाँ भी नहीं लगता था ।न जाने क्यों अब उन्हें एकान्त प्रिय लगने लगा ।एकान्त मिलते ही उनका मन श्याम कुन्ज में पहुँच जाता ।रोकते- रोकते - भी वह उन बड़ी -बड़ी झुकी आँखों , स्वर्ण गौर वर्ण, कपोलों पर ठहरी अश्रु बूँदों, सुघर नासिका , उसमें लगी हीरक कील , कानों में लटकती झूमर , वह आकुल व्याकुल दृष्टि ,उस मधुर कंठ-स्वर के चिन्तन में खो जाता ।वे सोचते ," एक बार भी तो उसने आँख उठाकर नहीं देखा मेरी ओर ।पर क्यों देखे ? क्या पड़ी है उसे ? उसका मन तो अपने अराध्य गिरधर में लगा है ।यह तो तू ही है , जो अपना ह्रदय उनके चरणों में पुष्प की तरह चढ़ा आया है, जहाँ स्वीकृति के कोई आसार भी नहीं और न ही आशा ।"
क्रमशः ................
॥श्री राधारमणाय समर्पणं ॥