Monday 28 March 2016

राधा रानी जी की अष्टसखियाँ

– विषाखा जी”
ललिता जिसमें सबसे प्रधान है। दूसरी है- विषाखा जी, तीसरी है चित्राजी, चौथी है चंपकलता, उसके बाद सुदेवीजी, तुंगविद्या, इंदुलिखा,रंगदेवी है. इनकी भी फिर सेविकाए है.
आज हम “विषाखा जी” के बारें में चर्चा करेंगे. तो विशाखा जी भाव में राधा जी की तरह ही है. उन्हीं के जैसे है जिस समय राधा जी का प्रादुर्भाव हुआ उसी समय विशाखा जी का जन्म हुआ है ,मतलब राधा जी के समान वे भी “चौदह वर्ष दो माही पद्रंह दिन” की है.
अष्ट सखियों में सबकी अलग ध्यान विधि है – वस्त्र सज्जा है. सबके अलग अलग मंत्र है. और इसके बाद इन सब की आठ-आठ सेविकाए है. जो उनकी सेवा करती है. वों “मंजरी सखी” कहलाती है. संतों ने इनका बडा प्यारा परिचय बताया है. क्योंकि राधा माधव को प्राप्त करने के लिए इनसे होकर जाना पडता है तो गेापी भाव प्राप्त करने के लिए इन्हीं सखियों का ध्यान करते है. चिंतन करते है. क्योंकि उनकी कृपा होनें पर राधा माधव अपने आप ही मिल जाएगें. तो हमें भक्त के पैर पकडनें है.
जैसे गज के पैर उस ग्राह ने पकडे थे डूबने लगा तो भगवान को पुकारा तो भगवान ने आकर उसको मारा, तो गज ने कहा – कि प्रभु पुकारा मैने आपको पुकारा मेरे से पहले उस ग्राह का क्यों उद्धार किया?
तो भगवान ने कहा – कि मै क्या करूँ ? जो मेरे भक्त के पैर पकड लेता है. मै पहले उसका उद्धार पहले करता हूँ.
“विषाखा” जी राधा जी की दूसरी सखी है. पहली ललिता जी तो विषाखा जी की वस्त्रावली कैसी है .- “वो तारावली वस्त्र पहनती है. अर्थात नील वस्त्र धारण करती है. जैसे तारें चमकेते है. इनकी विघुत के समान क्रातिं है, गौर वर्ण की है. “यावट गाँव” की है. इनके माता-पिता भी वहीं के है. इनके माता-पिता का नाम “दक्षिणा” और “पावन” है . इनका विवाह “वाहिक” नामक गेाप के साथ हुआ .
श्री राधा कुण्ड के उत्तर-पूर्व कोणवर्ती दल पर “आनन्द” (विषाखानन्द ) नामक कुंज है, वह मेघ कांति से युक्त है.कृष्ण वल्लभा श्री विशाखा जी वहाँ विराजती है.यह स्वाधीन भर्तृका नायिका के भाव से श्री कृष्ण में सदा प्रीति करती है . इनका वर्ण गौर है वे भी “१४ वर्ष २ मास १५ दिन” की है.
गौर लीला में –
विषाखा जी गौर लीला में “श्री रायरामानंद” करके विख्यात हुई.
निकुजं में इनकी सेवा –
ये भगवान श्री कृष्ण की सेवा “वस्त्र आभूषण” है.
श्री विषाखा जी का मंत्र –
“ऐं सौ विषाखायै स्वाहा” है . संत जन इसी का जप करते है .
श्री विषाखा जी ध्यान विधि
सच्चम्पकावलिविडामि्ब –तनुं सुशीलां
ताराम्बरां विविध भूषणशोभमानाम्
श्रीनन्दनन्दनपुरो वसनादीभूषा दाने रतां
सुकुतुकांच भजे विशाखाम्
अर्थात – “जिनकी अंगकांति चंपकपुष्पावली की कांति को पराजित करने वाली है . अति सुशीला है , जो तारावली के सदृष्य मनोहर वस्त्र को धारण करती है . जो श्री नन्दनन्दन को वस्त्रभूषादि नित्य देने की सेवा करती है .ऐसी विषाखा जी के चरणों मे हमारा प्रणाम है.”
इनकी भी अष्टसखियों का यूथ है . – मालती, माधुरी, चंद्रलेखा, सुभानना, कुजंरी, हरिणी, सुरभि, चपला, है. ये आठ सखियाँ है.
चैतन्य महाप्रभु कौन है. एक बार जब भगवान को राधा जी का वियोग बहुत ज्यादा हुआ तो राधा जी ने भगवान से कहा – कि आप मेरा विरह कभी नहीं समझ सकते. आप राधा होते तो जानते ?
भगवान ने कहा – कि जब कलियुग में मेरा अवतार होगा तो शरीर तो राधा का होगा, पर आत्मा कृष्ण की रहेगी. तब मै तुम्हारी विरह वेदना को समझ सकूगाँ. तो कहते चैतन्य महाप्रभु के चरणों में वहीं चिन्ह थे जो राधा जी के चरणों में थे. इसलिए उनकी आत्मा कृष्ण और शरीर राधा जी का था. तो उसी विरह में पेड से लिपट जाते थे.
जो रायमानंद जी है. गोविंद जी है. ये जो चैतन्य महाप्रभु के साथ भक्त है वो गेापियाँ ही है. तो विशाखा जी जो उनके साथ “रायरामानंद” करके विख्यात हुई. सखियाँ कैसे पीछे हो सकती है. तो चैतन्य महाप्रभु के साथ बहुत भक्त थे.
प्रत्येक सखी का अपना-अपना कुजं है. वे वहीं रहती है. तो विशाखा जी “आनन्द” नामक कुडं में निवास करती है.
इनकी सेवा क्या है.- जैसे ललिता जी की तामूल फल की है . वैसे ही इनकी सेवा “वस्त्र आभूषण” है.
इनका जो “मंत्र” है – “ऐं सौ विषाखायै स्वाहा” है . संत जन इसी का जप करते है .
संत कहते है. . हमें अगर ध्यान करना है – विषाखा जी का तो “जिनकी अंग क्रांति चंपक पुष्प को पराजित करने वाली है . जो तारावली के सदृष्य मनोहर वस्त्र को धारण करती है . जो श्यामनंदन को वस्त्र नित्य देके सेवा करती है .ऐसी विषाखा जी के चरणों मे हमारा प्रणाम है.”

Friday 25 March 2016

हनुमान जी और अमरीका :-


राम रावण युद्ध के उपरांत पाताल नरेश अहिरावण द्वारा श्री राम व लक्ष्मण के अपहरण की कथा लगभग हर हिन्दू जानता है। यह भी सर्वविदित है कि उसके बाद हनुमान जी पाताल गए जहाँ उनकी भेंट अपने पुत्र मकरध्वज से हुई। हनुमानजी ने अहिरावण को मारकर राम लक्ष्मण को मुक्त कराया व मकरध्वज को पाताल नरेश बनाकर वापस आये।
आजतक वह पाताल कहाँ है, यह रहस्य शोधकर्ताओं के लिए एक पहेली ही बना रहा। किन्तु माना जाता है कि एक साहसिक खोजी थिएडॉर मॉर्ड ने 12 जुलाई 1940 को इस रहस्य पर से पर्दा हटा दिया। मॉर्ड के अनुसार उन्होंने मध्य अमेरिका के जंगलों में एक ऐसा कबीला या फिर एक गांव जैसा दिखने वाला शहर ढूंढ़ निकाला, जहां का देवता एक वानर जैसा दिखने वाला इंसान था ! मॉर्ड ने उस जगह का नाम "लॉस्ट सिटी ऑफ मन्की गॉड" रखा !
मॉर्ड की मानें तो मध्य अमेरिका के मसक्यूशिया वर्षा जंगलों में करीब 32,000 वर्ग मील में फैली यह जगह अभी तक लोगों की नज़रों से छिपी हुई है ! अपने एक साथी लॉरेन्स के साथ 4-5 महीनों तक जंगलों में भटकने के बाद उन्हें यह जगह मिली, जहाँ की दीवारें किसी आम पत्थर से नहीं बल्कि सफेद संगमरमर के पत्थरों से बनी हुई थी !
उस जगह को देखकर ऐसा लगा कि मानो किसी समय यहां कोई बड़ा साम्राज्य रहा होगा। उस शहर के चारों ओर संगमरमर की सफेद दीवारों का घेरा था ! कुछ लोगों से पूछताछ करने पर मॉर्ड को पता लगा कि यहां कोई ऐसी प्रजाति रहा करती थी जिनका देवता एक बंदर की भांति दिखने वाला मानव था !
वह ना तो पूरी तरह से मानव था और ना ही पूर्ण रूप से बंदर ! लोगों का मानना है कि शायद आज भी उस विशाल बंदर की कोई मूर्ति वहां की जमीन के नीचे दबी हुई है !
मॉर्ड को स्थानीय लोगों ने बताया कि वहां रहने वाले लोगों द्वारा उस स्थान और अपने प्रभु को पाने के लिए कई तरह के युद्ध भी लड़े गए थे और युद्ध जीतने के बाद रिवाज़ के रूप में उन्होंने उन मृत शवों को ग्रहण भी किया था ! यह सुनने में बेहद अटपटा लगता है लेकिन सच में उस समय वहां क्या हुआ था यह कोई नहीं जानता !
मॉर्ड द्वारा जिस जगह की खोज की गई थी, ठीक उसी जगह का उल्लेख रामायण में हजारों वर्षों पहले किया गया था ! रामायण के मुताबिक हनुमानजी एक समय मध्य अमेरिका जरूर गए थे ! जैसा कि सभी जानते हैं कि हिन्दू धर्म में हनुमानजी ऐसे देवता हैं जिनका शरीर देखने में तो बिल्कुल एक बंदर की भांति, किन्तु उनकी चाल-ढाल तथा वाणी इंसानों वाली ही वर्णित है !
वर्तमान में यह पाताल लोक मध्य अमेरिका तथा ब्राजील का ही हिस्सा माना जा सकता है, क्योंकि यह पृथ्वी के ग्लोब के आधार पर भारत देश से बिल्कुल उल्टी दिशा में पड़ता है, जो जमीन से काफी नीचे है ! इसीलिए इसे पाताल लोक माना जा सकता है !
हनुमानजी के पुत्र मकरध्वज भी हूबहू हनुमान जी के सामान ही दिखते रहे होंगे ! पाताल नरेश अहिरावण को मारकर राम लक्ष्मण को मुक्त करने और अपने पुत्र को वहां का राजा बनाने के बाद हनुमान जी तो वापस लौट गए, किन्तु वहां के सभी लोग मकरध्वज को अपना भगवान मानकर उनकी पूजा करने लगे ! यह एक कारण हो सकता है कि क्यों मॉर्ड द्वारा खोजी हुई उस जगह पर लोगों द्वारा एक बंदर जैसे दिखने वाले जीव की पूजा की जाती थी !
हो सकता है कि मॉर्ड द्वारा खोजे गए शहर के वासियों का देवता और हनुमानजी के पुत्र मकरध्वज एक ही हों ! दूसरी ओर कुछ पुरातत्व वेत्ताओं का यह भी मानना है कि वह देवता स्वयं भगवान हनुमान ही हो सकते हैं ! अपनी खोज से वापस लौटते समय मॉर्ड अपने साथ निशानी के तौर पर काफी सारी चीज़ें लेकर आए थे,
ताकि वैज्ञानिक उनकी खोज पर यकीन कर सकें, किन्तु मॉर्ड ने अपनी खोज की सारी बातें कभी भी विस्तार से नहीं बताई थी ! ना ही उन्होंने कभी बताया कि जिस व्हाइट सिटी को उन्होंने खोज निकाला था, उस तक पहुंचने का रास्ता क्या है ? मॉर्ड ने पुरातत्वविदों से कई अनुभव बांटे लेकिन मूल संदर्भ से कुछ भी नहीं बताया !
यह भी हो सकता है कि इन तथ्यों के अलावा और भी ना जाने कितने ही अनगिनत प्रमाण होंगे जो मॉर्ड ने छिपा कर रखे थे ! कहते हैं मॉर्ड नहीं चाहते थे कि लोग उस जगह को खोज निकालें और वहां की खूबसूरती और अनमोल वस्तुओं को चुराकर वहां की चीज़ों को नष्ट करें ! सबसे हैरानी की बात तो यह है कि अचानक वर्ष 1954 में रहस्यमयी तरीके से मॉर्ड की मौत हो गई और उस जगह का हर एक राज़ उनके साथ ही खत्म हो गया !
लेकिन 2012 में आधुनिक राडार प्रौद्योगिकी द्वारा किये गए सर्वेक्षण में इस घने जंगल के अन्दर छुपे रहस्यों के विषय में आश्चर्यजनक जानकारीयां मिलीं और फिर अमेरिकी पुरातत्वविद् क्रिस फिशर के नेतृत्व में एक टीम जमीनी हकीकत जानने वहां जा पहुंची ।
पुरातत्वविदों की इस टीम ने ने होंडुरास के घने जंगल में दो शहरों की खोज की, जहाँ उन्हें पिरामिड, प्लाजा और आधे मानव व आधे जगुआर जैसी कलाकृतियां भी मिलीं ।
अभियान के नेता फिशर ने पत्रकारों को बताया कि इन दोनों शहरों में न केवल मकान, प्लाजा व संरचनाएं विद्यमान थीं, बल्कि अंग्रेजों जैसे उद्यान, घरेलू बगीचे, फसलों के खेत व सड़क आदि भी थे |
बंदरों की बहुतायत के कारण उन्होंने इसे “बन्दर भगवान का खोया शहर” होने की संभावना भी जताई जिसका 1940 में खोजी पत्रकार थिओडोर मोर्डे ने होंदुरण जंगल में खोज का दावा किया था और शताब्दियों से स्पेनिश कथा कहानियों में व पौराणिक आख्यानों में जिसका वर्णन "व्हाइट सिटी" के रूप में किया गया है ।
यह अद्भुत स्थान भारतीय वांग्मय में वर्णित पाताल लोक है अथवा नहीं, यह रहस्य तो आज भी यथावत बना हुआ है, किन्तु शोधकर्ताओं को एक विषय तो मिल ही गया है। और हमें चर्चा को..

जानिए कौन-सा धर्मग्रंथ कब लिखा गया…


आजकल किसी भी संप्रदाय के ग्रंथ को धर्मग्रंथ ही कहा जाता है। धर्मग्रंथ किसी भी संप्रदाय या धर्म का आधार होता है। जिस संप्रदाय के पास अपना कोई एक धर्मग्रंथ नहीं, उसका कोई वजूद नहीं। धर्मग्रंथों में जहां इतिहास और कानून की बातें होती हैं वहीं उनमें धर्म की बातें भी होती हैं।
धर्म की बात से तात्पर्य यह कि उसमें सत्य, अहिंसा, शांति और भाईचारे का पैगाम होता है। उसमें इहलोक और परलोक की भी कई रहस्यमय बातें लिखी होती हैं, जैसे स्वर्ग और नर्क, देवी और देवता, परमेश्वर और शैतान, जन्म और मृत्यु।
कुछ धर्मग्रंथ पुनर्जन्म में विश्‍वास व्यक्त करते हैं तो कुछ नहीं। ऐसा नहीं है कि धर्मग्रंथों का केंद्र ईश्वर ही हो, जैन और बौद्ध धर्मग्रंथों में ईश्वर की चर्चा नहीं की गई है।
इसी तरह ऐसी कई मान्यताएं और विश्वास हैं, जो सभी धर्मों में समान है तो कुछ विरोधी भी और विरोधाभाषी भी। कुछ तार्किक तो कुछ अतार्किक भी।
हमने देखा है कि कुछ धर्मग्रंथ किसी एक व्यक्ति विशेष के विचार से भरा है तो कुछ धर्मग्रंथ अनेक व्यक्तियों के विचारों का संकलन है। किसी में ईश्वर, कानून और समाज की बातें ही अधिक हैं, तो कुछ में दार्शनिक प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत किया गया है।
कुछ मानव समूह को निर्देश, आदेश और ईश्‍वरीय संदेश देते हैं तो कुछ रहस्यवाद की बात करते हैं। खैर… बुद्धिमान और दिमागी रूप से स्वतंत्र मनुष्य वही है, जो सभी धर्मग्रंथों का अच्छे से अध्ययन करे और विज्ञानसम्मत बातें करें। आइये हम जानते हैं कि कौन-सा धर्मग्रंथ कब लिखा गया?
हिन्दू धर्मग्रंथ…
हिन्दू धर्मग्रंथ : देशी और विदेशी शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के अनुसार संस्कृत में लिखे गए ‘ऋग्वेद’ को दुनिया की प्रथम और सबसे प्राचीन पुस्तक माना जाता है। हिन्दू धर्म इसी ग्रंथ पर आधारित है। इस ग्रंथ को इतिहास की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण रचना माना गया है। प्रोफेसर विंटरनिट्ज मानते हैं कि वैदिक साहित्य का रचनाकाल 2000-2500 ईसा पूर्व हुआ था।
लिखित रूप से पाया गया ऋग्वेद इतिहासकारों के अनुसार 1800 से 1500 ईस्वी पूर्व का है। इसका मतलब कि आज से 3 हजार 815 वर्ष पूर्व इसे लिखा गया था।
हालांकि शोधकर्ता यह भी कहते हैं कि वेद वैदिककाल की वाचिक परंपरा की अनुपम कृति है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिछले 6-7 हजार ईस्वी पूर्व से चली आ रही है, क्योंकि इसमें उक्त काल के ग्रहों और मौसम की जानकारी से इसकी प्राचीनता सिद्ध होती है।
खैर, हम यह मान लें कि 3 हजार 815 वर्ष पूर्व लिखे गए अर्थात महाभारत काल के बहुत बाद में तब लिखे गए, जब ह. अब्राहम थे जिनको इस्लाम में इब्राहीम कहा जाता है।
महान खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईसा पूर्व में हुआ यानी 5152 वर्ष पूर्व। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी।
शोधानुसार पता चलता है कि भगवान राम का जन्म आज से 7129 वर्ष पूर्व अर्थात 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था। चैत्र मास की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है।
उल्लेखनीय है कि वेदों का सार उपनिषद और उपनिषदों का सार गीता है। 18 पुराण, स्मृतियां, महाभारत और रामायण हिन्दू धर्मग्रंथ नहीं हैं। वेद, उपनिषद और गीता ही धर्मग्रंथ हैं।
जैन धर्मग्रंथ…
जैन धर्मग्रंथ : जैन धर्म का मूल भारत की प्राचीन परंपराओं में रहा है। आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है। जैन धर्म की प्राचीनता प्रामाणिक करने वाले अनेक उल्लेख वैदिक साहित्य में प्रचुर मात्रा में हैं।
अर्हंतं, जिन, ऋषभदेव, अरिष्टनेमि आदि तीर्थंकरों का उल्लेख ऋग्वेदादि में बहुलता से मिलता है जिससे यह स्वतः सिद्ध होता है कि वेदों की रचना के पहले जैन-धर्म का अस्तित्व भारत में था।
महाभारतकाल में इस धर्म के प्रमुख नेमिनाथ थे। जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर अरिष्ट नेमिनाथ भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे। माना जाता है कि ईसा से 800 वर्ष पूर्व 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए जिनका जन्म काशी में हुआ था।
599 ईस्वी पूर्व अर्थात 2614 वर्ष पूर्व अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने तीर्थंकरों के धर्म और परंपरा को सुव्यवस्थित रूप दिया। कैवल्य का राजपथ निर्मित किया। संघ-व्यवस्था का निर्माण किया- मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका। यही उनका चतुर्विध संघ कहलाया। भगवान महावीर ने 72 वर्ष की आयु में देह त्याग किया।
यहूदी धर्मग्रंथ…
यहूदी धर्मग्रंथ : यहूदियों के धर्मग्रंथ ‘तनख’ के अनुसार यहूदी जाति का उद्भव पैगंबर हजरत अबराहम (इस्लाम में इब्राहीम, ईसाइयत में अब्राहम) से शुरू होता है। आज से करीब 4,000 साल पुराना यहूदी धर्म वर्तमान में इसराइल का राजधर्म है।
दुनिया के प्राचीन धर्मों में से एक यहूदी धर्म से ही ईसाई और इस्लाम धर्म की उत्पत्ति हुई है। यहूदी धर्म की शुरुआत पैगंबर अब्राहम (अबराहम या इब्राहीम) से मानी जाती है, जो ईसा से लगभग 1800 वर्ष पूर्व हुए थे अर्थात आज से 3814 वर्ष पूर्व।
ईसा से लगभग 1,400 वर्ष पूर्व अबराहम के बाद यहूदी इतिहास में सबसे बड़ा नाम ‘पैगंबर मूसा’ का है। मूसा ही यहूदी जाति के प्रमुख व्यवस्थाकार हैं। मूसा को ही पहले से ही चली आ रही एक परंपरा को स्थापित करने के कारण यहूदी धर्म का संस्थापक माना जाता है।
यहूदी मान्यता के अनुसार यहोवा (ईश्वर) ने तौरात (तोराह व तनख) जो कि मूसा को प्रदान की, इससे पहले सहूफ़-ए-इब्राहीमी, जो कि इब्राहीम को प्रदान की गईं। यह किताब अब लुप्त हो चुकी है। इसके बाद ज़बूर, जो कि दाऊद को प्रदान की गई। फिर इसके बाद इंजील (बाइबल), जो कि ईसा मसीह को प्रदान की गई।
अब्राहम और मूसा के बाद दाऊद और उसके बेटे सुलेमान को यहूदी धर्म में अधिक आदरणीय माना जाता है। सुलेमान के समय दूसरे देशों के साथ इसराइल के व्यापार में खूब उन्नति हुई। सुलेमान का यहूदी जाति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 37 वर्ष के योग्य शासन के बाद सन् 937 ईपू में सुलेमान की मृत्यु हुई।
यहूदियों की धर्मभाषा ‘इब्रानी’ (हिब्रू) और यहूदी धर्मग्रंथ का नाम ‘तनख’ है, जो इब्रानी भाषा में लिखा गया है। इसे ‘तालमुद’ या ‘तोरा’ भी कहते हैं। असल में ईसाइयों की बाइबिल में इस धर्मग्रंथ को शामिल करके इसे ‘पुराना अहदनामा’ अर्थात ओल्ड टेस्टामेंट कहते हैं। तनख का रचनाकाल ईपू 444 से लेकर ईपू 100 के बीच का माना जाता है।
पारसी धर्मग्रंथ…
पारसियों का धर्मग्रंथ ‘जेंद अवेस्ता’ : पारसी धर्म या ‘जरथुस्त्र धर्म’ विश्व के अत्यंत प्राचीन धर्मों में से एक है जिसकी स्थापना आर्यों की ईरानी शाखा के एक प्रोफेट जरथुष्ट्र ने की थी। इसके धर्मावलंबियों को पारसी या जोराबियन कहा जाता है।
यह धर्म एकेश्वरवादी धर्म है। ये ईश्वर को ‘आहुरा माज्दा’ कहते हैं। ‘आहुर’ शब्द ‘असुर’ शब्द से बना है। जरथुष्ट्र को ऋग्वेद के अंगिरा, बृहस्पति आदि ऋषियों का समकालिक माना जाता है। वे ईरानी आर्यों के स्पीतमा कुटुम्ब के पौरूषहस्प के पुत्र थे।
उनकी माता का नाम दुधधोवा (दोग्दों) था, जो कुंवारी थी। 30 वर्ष की आयु में जरथुस्त्र को ज्ञान प्राप्त हुआ। उनकी मृत्यु 77 वर्ष 11 दिन की आयु में हुई। महान दार्शनिक नीत्से ने एक किताब लिखी थी जिसका नाम ‘‍दि स्पेक ऑव जरथुस्त्र’ है। कई विद्वान मानते हैं कि जेंद अवेस्ता तो अथर्ववेद का भाष्यांतरण है।
फारस के शहंशाह विश्तास्प के शासनकाल में पैगंबर जरथुस्त्र ने दूर-दूर तक भ्रमण कर अपना संदेश दिया। इतिहासकारों का मत है कि जरथुस्त्र 1700-1500 ईपू के बीच हुए थे। यह लगभग वही काल था, जबकि हजरत इब्राहीम अपने धर्म का प्रचार-प्रसार कर रहे थे।
पारसियों का धर्मग्रंथ ‘जेंद अवेस्ता’ है, जो ऋग्वैदिक संस्कृत की ही एक पुरातन शाखा अवेस्ता भाषा में लिखा गया है। यही कारण है कि ऋग्वेद और अवेस्ता में बहुत से शब्दों की समानता है। ऋग्वेदिक काल में ईरान को पारस्य देश कहा जाता था।
अफगानिस्तान के इलाके से आर्यों की एक शाखा ने ईरान का रुख किया, तो दूसरी ने भारत का। ईरान को प्राचीनकाल में पारस्य देश कहा जाता था। इसके निवासी अत्रि कुल के माने जाते हैं।
बौद्ध धर्मग्रंथ…
बौद्ध धर्मग्रंथ : बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए, जो त्रिपिटकों मे संकलित हैं। त्रिपिटक के 3 भाग हैं- विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक। उक्त पिटकों के अंतर्गत उपग्रंथों की विशाल श्रृंखलाएं हैं। सुत्तपिटक के 5 भागों में से एक खुद्दक निकाय की 15 रचनाओं में से एक है धम्मपद। धम्मपद ज्यादा प्रचलित है।
बौद्ध धर्म के मूल तत्व हैं- 4 आर्य सत्य, आष्टांगिक मार्ग, प्रतीत्यसमुत्पाद, अव्याकृत प्रश्नों पर बुद्ध का मौन, बुद्ध कथाएं, अनात्मवाद और निर्वाण। बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए, जो त्रिपिटकों में संकलित हैं।
त्रिपिटक के 3 भाग हैं- विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक। उक्त पिटकों के अंतर्गत उपग्रंथों की विशाल श्रृंखलाएं हैं। सुत्तपिटक के 5 भाग में से एक खुद्दक निकाय की 15 रचनाओं में से एक है धम्मपद। धम्मपद ज्यादा प्रचलित है।
हालांकि धम्मपद पहले से ही विद्यमान था, लेकिन उसकी जो पां‍डुलिपियां प्राप्त हुई हैं, वे 300 ईसापूर्व की हैं। भगवान बुद्ध के निर्वाण (देहांत) के बाद प्रथम संगीति राजगृह में 483 ईसा पूर्व हुई थी।
दूसरी संगीति वैशाली में, तृतीय संगीति 249 ईसा पूर्व पाटलीपुत्र में हुई थी और चतुर्थ संगीति कश्मीर में हुई थी। माना जाता है कि चतुर्थ संगीति में ईसा मसीह भी शामिल हुए थे। माना जाता है कि तृतीय बौद्ध संगीति में त्रिपि‍टक को अंतिम रूप दिया गया था।
वैशाख माह की पूर्णिमा के दिन बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी में ईसा पूर्व 563 को हुआ। इसी दिन 528 ईसा पूर्व उन्होंने भारत के बोधगया में सत्य को जाना और इसी दिन वे 483 ईसा पूर्व को 80 वर्ष की उम्र में भारत के कुशीनगर में निर्वाण (मृत्यु) को उपलब्ध हुए।
ईसाई धर्मग्रंथ…
बाइबल : ईसाई धर्म का धर्मग्रंथ बाइबिल है जिसे ‘बाइबल’ भी कहा जाता है। इसके 2 भाग हैं- पूर्वविधान (ओल्ड टेस्टामेंट) और नवविधान (न्यू टेस्टामेंट)।
बाइबिल में यहूदियों के धर्मग्रंथ तनख को ही पूर्वविधान के तौर पर शामिल किया गया। पूर्वविधान को तालमुद और तोरा भी कहते हैं। इसका मतलब ‘पुराना अहदनामा’।
नवविधान (न्यू टेस्टामेंट) ईसा मसीह के बाद की रचना है जिसे ईसा मसीह के शिष्यों ने लिखा था। इसमें ईसा मसीह का जीवन परिचय और उनके उपदेशों का वर्णन है। इसके अलावा शिष्यों के कार्य लिखे गए हैं।
माना जाता है कि इसकी मूलभाषा अरामी और ग्रीक थी। नवविधान में ईसा के संदेश और जीवनी का उनके 4 शिष्यों द्वारा वर्णन किया गया है। ये 4 शिष्य हैं- मत्ती, लूका, युहन्ना और मरकुस।
हालांकि उनके कुल 12 शिष्य थे। बाइबिल कुल मिलाकर 72 ग्रंथों का संकलन है- पूर्वविधान में 45 तथा नवविधान में 27 ग्रंथ हैं। नए नियम को इंजील कहा जाता है।
बाइबिल के पूर्वविधान का रचनाकाल क्रमश: 1400 ईसापूर्व से 100 ईपू के बीच रचा गया माना गया है। हालांकि तनख का रचनाकाल ईपू 444 से लेकर ईपू 100 के बीच का माना जाता है।
माना जाता है कि ह. मूसा ने लगभग 1400 ईपू में पूर्वविधान का कुछ अंश लिखा था। पूर्वविधान की अधिकांश रचनाएं 900 ईपू और 100 ईपू के बीच की हैं।
बाइबिल के नवविधान से ही ईसाई धर्म की शुरुआत मानी जाती है जिसका रचनाकाल सन् 50 ईस्वी से सन् 100 ईस्वी तक अर्थात 50 वर्ष की अवधि में यह ग्रंथ लिखा गया।
माना जाता है कि सन् 66 में इसको मुकम्मल तौर पर एक किताब का रूप दिया गया। लगभग सन् 400 ई. में संत जेरोम ने समस्त बाइबिल की लैटिन अनुवाद प्रस्तुत किया था, जो वुलगाता (प्रचलित पाठ) कहलाता है और शताब्दियों तक बाइबिल का सर्वाधिक प्रचलित रूप रहा है।
इस्लाम का धर्मग्रंथ…
कुरान (कुरआन) : कुरान इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक है। हजरत मोहम्मद साहब पर जो अल्लाह की पवित्र किताब उतारी गई है, वह है- कुरआन। अल्लाह ने फरिश्तों के सरदार जिब्राइल अलै. के मार्फत पवित्र संदेश (वही) सुनाया। उस संदेश को ही कुरआन में संग्रहीत किया गया है। कुरान में कुल 114 अध्याय हैं जिन्हें सूरा कहते हैं। हर अध्याय में कुछ श्लोक हैं जिन्हें आयत कहते हैं।
इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार कुरान की पहली आयत सन् 610 में उतरी थी और हजरत मुहम्मद की वफात तक सन् 632 तक कुरान की आयतें उतरती रहीं। प्रारंभिक काल में इन आयतों का मौखिक रूप से प्रचार प्रसार किया गया लेकिन बाद में इन आयतों का संकलन हजरत मुहम्मद सा. की वफात के बाद सन् 633 में इसे पहली बार लिखा गया और 653 में इसे पुस्तक का रूप देकर इसकी प्रतियां इस्लामिक साम्राज्य में वितरित की गईं। इसका मतलब यह कुरान आज से 1403 वर्ष पुरानी है।
इस्लामिक मान्यता के अनुसार तृतीय खलीफा हजरत उस्मान (रजि.) ने अपने सत्ता समय में हजरत सिद्दीके अकबर (र‍जि.) द्वारा संकलित कुरआन की 9 प्रतियां तैयार करके कई देशों में भेजी थीं उनमें से 2 कुरआन की प्रतियां अभी भी पूर्ण सुरक्षित हैं। एक ताशकंद में और दूसरी तुर्की में उपस्थित हैं।
सिख धर्मग्रंथ…
सिख धर्मग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब : श्री गुरुनानक देवजी से लेकर श्री गुरु गोविंद सिंहजी तक गुरुगद्दी शारीरिक रूप में रही, क्योंकि इन सभी गुरुजियों ने भौतिक शरीर को धारण करके मानवता का कल्याण किया। पर 10वें गुरुजी ने शरीर का त्याग करने से पहले सारी सिख कौम को आदेश दिया कि आज से आपके अगले गुरु ‘श्री गुरुग्रंथ साहिब’ हैं।
इस पवित्र ग्रंथ में सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानक और अन्य गुरुओं के साथ ही हिन्दू और मुस्लिम संतों की वाणियां भी शामिल की गई हैं। इन संतों के नाम हैं- जयदेव, परमानंद, कबीर, रविदास, नामदेव, सघना, धन्ना, शेख फरीद आदि।
गुरुग्रंथ साहिब के प्रथम संग्रहकर्ता 5वें गुरु अर्जुनदेवजी हुए थे, उनके बाद भाई गुरुदास इसके संपादक हुए। 16 अगस्त 1604 ई. को हरिमंदिर साहिब, अमृतसर में गुरुग्रंथ साहिब की स्थापना हुई थी। 1705 ई. में ‘दमदमा साहिब’ में गुरु गोविंद सिंह ने गुरु तेगबहादुर के 116 शब्दों को और जोड़कर इस ग्रंथ को पूर्ण किया। इस ग्रंथ में कुल 1430 पृष्ठ हैं।
ब्रिटिश लाइब्रेरी के पास गुरुग्रंथ साहिब की बहुत पुरानी प्रति मौजूद है। इस प्रति को पहले 100 साल पुराना माना जाता था, लेकिन अब नए अनुसंधानों से पता चला है कि ये 1660 से 1675 के बीच की प्रति है।
ब्रिटिश लाइब्रेरी की ये खोज सेंट जॉन्स कॉलेज, कैम्ब्रिज के डॉ. जीवन देवल ने की थी। इस प्रति को ब्रिटिश म्यूजियम के लिए ए. फिशर नामक मिशनरी ने अमृतसर, पंजाब में 1884 में खरीदा था। गुरुग्रंथ साहिब का संकलन 1604 में किया गया था।

भारत में धर्म का विस्तार :-


आज से तीन हजार वर्ष पहले तक कश्मीर से कन्याकुमारी तक और अफगानिस्तान की हिन्दू कुश पर्वतमाला से लेकर बांग्लादेश की खाड़ी और बर्मा तक भारत में सिर्फ हिन्दू धर्म था, जिसे वैदिक धर्म या आर्यो का धर्म माना जाता था। इस धर्म को 3000 हजार ईसा पूर्व सर्वप्रथम संगठित रूप दिया भगवान कृष्ण ने, लेकिन कालक्रम में यह पुन: बिखर कर भिन्न-भिन्न जातियों में बदल कर असं‍गठित हो गया।
इस असंगिठित हिन्दू धर्म के साथ ही जैन धर्म की एक परंपरा शुरुआत से ही जुड़ी हुई चली आ रही थी जिसे सबसे पहले एक सुगठित सामाजिक रूप मिला पार्श्वनाथ के काल में। इससे पूर्व इस परंपरा को विदेहियों की परंपरा कहा जाता था। राजा जनक उसी परंपरा से थे।
बाद में भगवान महावीर ने मुनियों और विदेहियों की इस जिन परंपरा को स्पष्ट रूप से गठित कर एक सरल मार्ग के रूप में बदला। इसके कारण क्रमश: इस परंपरा ने जैन धर्म के रूप में आकार ले लिया। उसी दौर में गौतम बुद्ध की प्रसिद्धि हो गई थी। गौतम बुद्ध के ज्ञान का इतना व्यापक असर हुआ कि 500 ईस्वी पूर्व एक नया धर्म अस्तित्व में आ गया जिसे ‘बौद्ध धर्म’ कहा जाने लगा।
बौद्ध काल और गुप्त काल को भारत का स्वर्ण काल माना जाता है। उसी दौर में ईसा से 3000 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आए यहूदी धर्म का एक ‍कबीला कश्मीर में आकर रहने लगा और धीरे-धीरे वह हिन्दू तथा बौद्ध संस्कृति में घुलमिल गया।
इसी तरह बौद्ध काल में ही शक, हूण, कुषाण, पारथीयन, ग्रीक और मंगोल आक्रमणकारी आए और उनके कुछ समूह यहां की संस्कृति और धर्म में मिलकर खो गए और ज्यादातर अपने देश लौट गए।
भारत में कुछ समूह व्यापारी बनकर आया और बाद में सत्ताधारी बन गया। कुछ समूह लुटने आया और लुटकर चला गया और कुछ ने आक्रमण कर यहां के भू-भाग पर कब्जा कर लिया। आइये जानते हैं कि किस तरह भारत बहुधर्मी देश बन गया।
यहूदी धर्म : आज से 2985 वर्ष पूर्व अर्थात 973 ईसा पूर्व में यहूदियों ने केरल के मालाबार तट पर प्रवेश किया। यहूदियों के पैगंबर थे मूसा, लेकिन उस दौर में उनका प्रमुख राजा था सोलोमन, जिसे सुलेमान भी कहते हैं।
नरेश सोलोमन का व्‍यापारी बेड़ा, मसालों और प्रसिद्ध खजाने के लिए आया। आतिथ्य प्रिय हिंदू राजा ने यहूदी नेता जोसेफ रब्‍बन को उपाधि और जागीर प्रदान की। यहूदी कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्य में बस गए। विद्वानों के अनुसार, 586 ईसा पूर्व में जूडिया की बेबीलोन विजय के तत्‍काल पश्‍चात कुछ यहूदी सर्वप्रथम क्रेंगनोर में बसे।
जैन धर्म : ईसा पूर्व छठी शताब्‍दी में महावीर ने जैन धर्म का प्रचार किया जिसके कारण बहुत से क्षत्रिय और ब्राह्मण जैन होते गए। चाणक्य का नाम कौन नहीं जानता। वे खुद जैन धर्म से प्रभावित होकर जैन हो गए थे। महावीर ने तप, संयम और अहिंसा का संदेश दिया।
बौद्ध धर्म : लगभग इसी दौर में बौद्ध धर्म की स्थापना हुई। गौतम बुद्ध एक क्षत्रिय राजकुमार थे। बुद्ध से प्रभावित होकर दलितों और ब्राह्मणों में भिक्षु होने की होड़ लग गई थी। बुद्ध के उपदेशों का चीन और कुछ अन्‍य दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भी प्रचार हुआ। बुद्ध पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने धर्म को एक व्यवस्था थी और ज्ञान को श्रे‍णीबद्ध किया। बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर ही बाद केईसाई धर्म में बहुत-सी बातें शामिल की गई।
ईसाई धर्म : व्यापक रूप से हुए एक शोध अनुसार ईसा मसीह ने कश्मीर में एक बौद्ध मठ में शिक्षा और दीक्षा ग्रहण की। ईसा मसीह के 12 शिष्यों में से एक शिष्य थे जिनका नाम था सेंट थॉमस। थॉमस ने ही सर्वप्रथम केरल के एक स्थान से ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार शुरू किया।
दक्षिण भारत में सीरियाई ईसाई चर्च, सेंट थॉमस के आगमन का संकेत देती है। इसके बाद सन 1542 में सेंट फ्रेंसिस जेवियर के आगमन के साथ भारत में रोमन कैथोलिक धर्म की स्‍थापना हुई जिन्होंने भारत के गरीब हिंदू और आदिवासी इलाकों में जाकर लोगों को ईसाई धर्म की शिक्षा देकर सेवा के नाम पर ईसाई बनाने का कार्य शुरू किया। इसके बाद भारत में अंग्रेजों के शासन के दौरान इस कार्य को और गति मिली। फिर भारत की आजादी के बाद ‘मदर टेरेसा’ ने व्यापक रूप से लोगों को ईसाई बनाया।
इस्‍लाम : सर्वप्रथम अरब व्‍यापारियों के माध्‍यम से इस्‍लाम धर्म 7वीं शताब्‍दी में दक्षिण भारत में आया। केरल और बंगाल दो उनके प्रमुख केंद्र थे, जबकि पश्चिम भारत में अफगानिस्तान।
इसके बाद 7वीं में ही मोहम्मद बिन कासिम ने बड़े पैमाने पर कत्लेआम कर भारत के बहुत बढ़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया जहां से हिन्दू जनता को पलायन करना पड़ा।
जो हिन्दू पलायन नहीं कर सके वह मुसलमान बन गए या मारे गए। जिस भू भाग पर कब्जा किया था वह आज का आधा पाकिस्तान है, जो पहले मगध था।
इनके पश्‍चात् अफगानी, ईरानी और मुगल साम्राज्य के दौर में भारत में इस्‍लाम धर्म दो तरीके से फला और फैला पहला सुफी संतों के प्रचार-प्रसार से तथा दूसरा मुस्लिम शासकों द्वारा किए गए दमन चक्र से।
जो अफगा‍नी, ईरानी, मुगल थे उनकी नस्ल का कहीं अता-पता नहीं चलता और कुछ गुलाम वंश के शासक भी अंग्रेजों के काल में अपने-अपने देश लौट गए रह गए तो वह भारतीय हिन्दू जो अब मुसलमान हो चुके थे।
पारसी धर्म : पारसी धर्म ईरान का प्राचीन धर्म है। ईरान के बाहर मिथरेज्‍म के रूप में रोमन साम्राज्‍य और ब्रिटेन के विशाल क्षेत्रों में इसका प्रचार-प्रसार हुआ। इसे आर्यों की एक शाखा माना जाता है।
ईरान पर इस्‍लामी विजय के पश्‍चात पारसियों को इस्लाम कबूल करना पड़ा तो कुछ पारसी धर्म के लोगों ने अपना गृहदेश छोड़कर भारत में शरण ली। कहा जाता है कि इस्लामिक अत्याचार से तस्त्र होकर पारसियों का पहला समूह लगभग 766 ईसा पूर्व दीव (दमण और दीव) पहुंचा। दीव से वे गुजरात में बस गए।
अब पूरी दुनिया में पारसियों की कुल आबादी संभवत: 100000 से अधिक नहीं है। ईरान में कुछ हजार पारसियों को छोड़कर लगभग सभी पारसी अब भारत में ही रहते हैं और उनमें से भी अधिकांश अब मुंबई में हैं।
सिख धर्म : 15वीं शताब्‍दी में सिख धर्म के संस्‍थापक गुरुनानक ने एकेश्‍वर और भाईचारे पर बल दिया। भारत के पंजाब में इस धर्म की उत्पत्ति हिन्दू और मुसलमान के बीच बढ़ रहे वैमनस्य के चलते हुई।
बाद में इस्लामिक अत्याचार से कश्मीरी पंडितों और देश के अन्य भागों से भाग रहे हिन्दुओं को बचाने के लिए ‘खालसा पंथ’ की स्थापना हुई। गुरु गोविंद सिंह और महाराजा रणजीत सिंह के काल में लोगों ने स्वयं को सुरक्षित महसूस किया।
इसके अलावा भारत में ऐसे बहुत से संत हुए हैं जिन्होंने अपना एक अलग संप्रदाय चलाया और अपने तरीके से एक नए धर्म को गढ़ने का प्रयास किया, लेकिन वह महज एक संप्रदाय में ही सिमटकर रह गए। ऐसे सैकड़ों संप्रदाय है जिनके कारण हिन्दू आपस में बंटा हुआ है।
अंतत: भारत एक ऐसा विशाल देश है जहां सर्वाधिक विविधता का मिश्रण है। इसके बावजूद सभी भारतीय है, क्योंकि सभी के पूर्वज आर्य या द्रविड़ थे और आज के शब्द में कहें तो हिन्दू ही थे। हम सभी ऋषि, मुनि, मनु और कष्यप ऋषि की संतानें हैं।
भारत में लगभग 15 प्रमुख भाषाएं हैं और 844 बोलियां हैं। आर्यों की संस्‍कृत भाषा के पूर्व द्रविड़ भाषा में विलय से भारत में कई नई भाषाओं की उत्‍पत्‍ति हुई। हिंदी, भारत की राष्‍ट्रीय भाषा है और हम सब भारतीय हैं। तीन से पांच हजार वर्ष पहले, गुजराती, मराठी, पंजाबी, तमिल या बंगाली भाषा नहीं थी। सभी जगह स्थानीय बोलियां थी और सभी संस्कृत के माध्यम से संपर्क में रहते थे।

महान सम्राट अशोक, जानिए कितने हैं सम्राट अशोक…


अशोक महान पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक मौर्य (राजा प्रियदर्शी देवताओं का प्रिय)। पिता का नाम बिंदुसार। दादा का नाम चंद्रगुप्त मौर्य। माता का नाम सुभद्रांगी। पत्नियों का नाम देवी (वेदिस-महादेवी शाक्यकुमारी), कारुवाकी (द्वितीय देवी तीवलमाता), असंधिमित्रा (अग्रमहिषी), पद्मावती और तिष्यरक्षित।
पुत्रों का नाम- देवी से पुत्र महेन्द्र, पुत्री संघमित्रा और पुत्री चारुमती, कारुवाकी से पुत्र तीवर, पद्मावती से पुत्र कुणाल (धर्मविवर्धन) और भी कई पुत्रों का उल्लेख है। धर्म- हिन्दू और बौद्ध। राजधानी पाटलीपुत्र।
सम्राट अशोक का नाम संसार के महानतम व्यक्तियों में गिना जाता है। ईरान से लेकर बर्मा तक अशोक का साम्राज्य था। अंत में कलिंग के युद्ध ने अशोक को धर्म की ओर मोड़ दिया। अशोक ने जहां-जहां भी अपना साम्राज्य स्थापित किया, वहां-वहां अशोक स्तंभ बनवाए। उनके हजारों स्तंभों को मध्यकाल के मुस्लिमों ने ध्वस्त कर दिया।
अशोक के समय मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर, कर्नाटक तक तथा पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफगानिस्तान तक पहुंच गया था। यह उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था।
अशोक महान ने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया। बिंदुसार की 16 पटरानियों और 101 पुत्रों का उल्लेख है। उनमें से सुसीम अशोक का सबसे बड़ा भाई था। तिष्य अशोक का सहोदर भाई और सबसे छोटा था। भाइयों के साथ गृहयुद्ध के बाद अशोक को राजगद्दी मिली।
अशोक का धर्म परिवर्तन…
कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार तथा विजित देश की जनता के कष्ट ने अशोक की अंतरात्मा को झकझोर दिया। सबसे अंत में अशोक ने कलिंगवासियों पर आक्रमण किया और उन्हें पूरी तरह कुचलकर रख दिया।
मौर्य सम्राट के शब्दों में, ‘इस लड़ाई के कारण 1,50,000 आदमी विस्थापित हो गए, 1,00,000 व्यक्ति मारे गए और इससे कई गुना नष्ट हो गए…’। युद्ध की विनाशलीला ने सम्राट को शोकाकुल बना दिया और वह प्रायश्चित करने के प्रयत्न में बौद्ध विचारधारा की ओर आकर्षित हुआ।
इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने पूर्वजों की तरह अशोक भी वैदिक धर्म का अनुयायी था। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ के अनुसार अशोक के इष्टदेव शिव थे, लेकिन अशोक युद्ध के बाद अब शांति और मोक्ष चाहते थे और उस काल में बौद्ध धर्म अपने चरम पर था।
सभी बौद्ध ग्रंथ अशोक को बौद्ध धर्म का अनुयायी बताते हैं। अशोक के बौद्ध होने के सबल प्रमाण उसके अभिलेख हैं। राज्याभिषेक से संबद्ध लघु शिलालेख में अशोक ने अपने को ‘बुद्धशाक्य’ कहा है।
भाब्रु लघु शिलालेख में अशोक त्रिरत्न- बुद्ध, धम्म और संघ में विश्वास करने के लिए कहता है और भिक्षु तथा भिक्षुणियों से कुछ बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन तथा श्रवण करने के लिए कहता है।
लघु शिलालेख से यह भी पता चलता है कि राज्याभिषेक के 10वें वर्ष में अशोक ने बोधगया की यात्रा की, 12वें वर्ष वह निगालि सागर गया और कोनगमन बुद्ध के स्तूप के आकार को दुगना किया।
महावंश तथा दीपवंश के अनुसार उसने तृतीय बौद्ध संगीति (सभा) बुलाई और मोग्गलिपुत्त तिस्स की सहायता से संघ में अनुशासन और एकता लाने का सफल प्रयास किया।
और कितने अशोक हुए..
पहला अशोक : कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ के अनुसार कश्मीर के राजवंशों की लिस्ट में 48वें राजा का नाम अशोक था, जो कि कनिष्क से तीन पीढ़ी पहले था। वह कश्मीर के गोनंद राजवंश का राजा था। इस राजा को धर्माशोक भी कहते थे।
दूसरा अशोक : हिन्दू पुराणों के अनुसार मौर्य वंश का तीसरा राजा अशोकवर्धन था, जो चंद्रगुप्त मौर्य का पौत्र और बिंदुसार का पुत्र था। इसी अशोक को महान सम्राट अशोक कहा गया था और इसी ने अशोक स्तंभ बनवाए और इसी ने कलिंग का युद्ध किया था। कलिंग के युद्ध के बाद यही अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था।
तीसरा अशोक : गुप्त वंश के दूसरे राजा समुद्रगुप्त का उपनाम अशोकादित्य था। समुद्रगुप्त को अनेक स्थानों पर अशोक ही कहा गया जिसके चलते भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। समुद्रगुप्त बड़ा ही साहसी और बुद्धिमान राजा था। उसने संपूर्ण भारतवर्ष में बड़े व्यापक स्तर पर विजयी अभियान चलाए थे।
चौथा अशोक : पुराणों में शिशुनाग वंश के दूसरे राजा का नाम भी अशोक था। वह शिशुनाग का पुत्र था। उसका काला रंग होने के कारण उसे ‘काकवर्णा’ कहते थे, हालांकि उसे कालाशोक नाम से भी पुकारा जाता था।
अशोक के संबंध में भ्रम का समाधान…
बौद्ध ग्रंथों में यद्यपि महान सम्राट अशोक के संबंध में बड़े विस्तार से उल्लेख मिलता है, लेकिन उनके वर्णण भी एक-दूसरे से भिन्न हैं। माना जाता है कि लेखकों ने अशोकादित्य (समुद्रगुप्त) और गोनंदी अशोक (कश्मीर का राजा) दोनों को मिलाकर एक चक्रवर्ती अशोक की कल्पना कर ली है।
इस स्थिति में यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल है कि बौद्ध धर्म का प्रचारक देवानांप्रिय अशोक कौन था। सम्राट अशोक को देवानांप्रिय भी कहा जाता था इसीलिए ज्यातातर विद्वानों ने मान लिया कि सम्राट अशोक का काल (269-232) ईस्वी पूर्व गद्दी पर बैठा था, जबकि यह गलत है।
अशोक सीरिया के राजा ‘एण्टियोकस द्वितीय’ और कुछ अन्य यवन राजाओं का समसामयिक था जिनका उल्लेख ‘शिलालेख संख्या 8’ में है। इससे विदित होता है कि अशोक ने ईसा पूर्व 3री शताब्दी के उत्तरार्ध में राज्य किया, किंतु उसके राज्याभिषेक की सही तारीख़ का पता नहीं चलता है। अशोक ने 40 वर्ष राज्य किया इसलिए राज्याभिषेक के समय वह युवक ही रहा होगा।
चीनी विवरण के आधार पर अशोक का काल 850 ईसा पूर्व, सीलोनी विवरण के आधार पर 315 ईसा पूर्व और राजतरंगिणी के अनुसार 1260 ईसा पूर्व।
पौराणिक कालगणना के अनुसार अशोक के राज्य के लिए निकाले गए 1472 से 1436 ईसा पूर्व के काल में और राजतरंगिणी के आधार पर धर्माशोक के लिए निकले राज्यकाल 1448 से 1400 ईसा पूर्व में कुछ-कुछ समानता है जबकि भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने वाले इतिहासकारों द्वारा निकाले गए 265 ईसा पूर्व के काल से कोई समानता ही नहीं है।
उक्त के आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान इतिहासकारों द्वारा अशोक के संबंध में निर्धारित काल निर्णय बहुत ही उलझा और अपुष्ट है जबकि भारत पौराणिक आधार पर कालगणना करने वालों और इतिहासकारों के बीच लगभग 1200 वर्ष का अंतर आ जाता है।
चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक और कनिष्क की जोन्स आदि पाश्‍चात्य विद्वानों द्वारा निर्धारित तिथियों के संदर्भ में एबी त्यागराज अय्यर की ‘इंडियन आर्किटेक्चर’ का निम्नलिखित उद्धरण भी ध्यान देने योग्य है-
‘एथेंस में कुछ समय पूर्व एक समाधि मिली थी, उस पर लिखा था कि- ‘यहां बौधगया के एक श्रवणाचार्य लेटे हुए हैं। एक शाक्य मुनि को उनके यूनानी शिष्य द्वारा ग्रीक देश ले जाया गया था। समाधि में स्थित शाक्य मुनि की मृत्यु 1000 ईसा पूर्व अंकित है।
यदि शाक्य साधु को 1000 ईसा पूर्व के आसपास यूनान ले जाया गया था तो कनिष्क की तिथि कम से कम 1100 ईसा पूर्व और अशोक की 1250 ईसा पूर्व और चंद्रगुप्त मौर्य की 1300 ईसा पूर्व होनी चाहिए और इस मान से भगवान बुद्ध उनके भी पूर्व हुए थे।
यदि यह मान लिया जाए तो संपूर्ण इतिहास ही बदल जाएगा। यूनानी साहित्य का सेड्रोकोट्टस चंद्रगुप्त मौर्य सेल्यूकस निकेटर का समकालीन था जिसने 303 ईसा पूर्व में भारत पर आक्रमण किया था, एकदम निराधार और अनर्गल है।’ (दि प्लाट इन इंडियन क्रोनोलॉजी पृ. 9)
अंग्रेज काल में नए सिरे से लिखे गए भारतीय इतिहास के कारण ही यह भ्रम की स्थिति उत्पन्न हई है कि भारतीय इतिहास में ठीक-ठीक तिथि निर्धारण नहीं है। भारत में अब तक जो भी सरकार सत्ता में रही उसने भी इसकी कभी चिंता नहीं ‍की कि भारत के इतिहास को खोजा जाए। ज्यादातर भारतीय इतिहासकारों ने विदेशी इतिहासकारों का अनुसरण ही किया है।
-संदर्भ ग्रंथ : भारतीय इतिहास का विकृतिकरण
हिन्दू राइटर्स फोरम, 129-बी., एमआईजी फ्लेट्स, राजौरी गार्डन, नई दिल्ली- 110027

सारा संसार एक बिन्दु पर :-


एक बार कई देवता मिलकर प्रजापति ब्रह्मा जी के समीप जाकर बोले-” भगवान् हम वह विद्या जानना चाहते हैं, जिसके जान लेने से ‘ अनुष्टुप् सिद्धि होती हो। किसी के मन की बात जान ले, कितनी ही दूर बैठे हुये अपने किसी प्रियजन के दर्शन कर लें, बातचीत कर लें, एक पल में कहीं भी जाकर वहाँ का सब कुछ देखकर लौट आने की विद्या सीखने के लिये आपके समीप हम देवगण उपस्थित हुये है।”
ब्रह्मा जी वह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और बोले- “आज मैं तुम्हें 6 नारसिंह चक्र का वर्णन करता हूँ, उसे जान लेने वाला ऐसी सिद्धियों का स्वामी हो जाता है।”
चार ‘अर’ (रथ आदि पहियों में जो गोलाकार डंडे लगे रहते हैं उन्हें ‘अर’ कहते हैं) वाला आचक्र, दूसरी भी चार अर वाला सूचक,तीसरा आठ अरों वाला महाचक्र, पाँच-पाँच अरों वाले चौथे और पाँचवें सकललोक रक्षण और द्यूतचक्र और अन्तिम आठ अरों वाला असुरान्त चक्र और इनके आन्तर, माध्यम एवं वाह् तीन लय हैं, इनको जानने वाले को सभी लोक सिद्ध हो जाते सो है देवगणों क्रमशः हृदय, शिर, शिखा, शेष सभी शरीर के सब अंगों में रहने वाले इन चक्रों को जानने का प्रयत्न कीजिये।
इन सूत्रों में विज्ञान के वह सिद्धान्त और रहस्य छिपे हुये हैं, जिन्हें यदि जान लिया जाय तो सचमुच मनुष्य ऐसी सिद्धि -सम्पदा को प्राप्त कर सकता है, जिसका संकेत प्रजापति ब्रह्मा ने उपरोक्त पंक्तियों में किया है किन्तु इस युग का शिक्षित और विज्ञान मुखापेक्षी व्यक्ति इसे केवल गरिमा कहकर टाल जाते हैं या उसका उपहास उड़ाते है और कहते हैं कि ऐसा भी कहीं सम्भव है कि मनुष्य किसी व्यक्ति के मन की बात जान ले, दूरवर्ती लोगों से बातचीत कर ले, वस्तुओं का स्थानान्तरण और दूरवर्ती सन्देश जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचे क्या कभी सम्भव हो सकते है?
टेलीफोन, रेडियो, बेतार का तार (वायरलैस) आदि की बात जाने दीजिये इनकी शक्ति और सीमा बहुत थोड़ी है। टेलीविजन भी अभी बड़ा महँगा और यांत्रिक है एक ऐसे आविष्कार की ओर ध्यान आकृष्ट कर रहे है जिससे उपरोक्त पौराणिक आख्यान को शब्दशः सत्य सिद्ध करने करने में अब थोड़ा ही समय और शेष रहा है। जब इस यंत्र का पूर्ण विकास हो जायेगा तो यह संसार इतना समीप आ जायेगा कि भारत और अमेरिका की दूरी ही नहीं विश्व ब्रह्माण्ड ही सिमट कर एक बिन्दू पर आ जायेगा।
ऐसी सम्भावना के प्रथम यंत्र का नाम है ‘टेल स्टार’ इसमें न तो कोई विध्वंसक है और न ही कोई ऐसे कारण जो अन्तरिक्ष यात्रा के काम आयें। इन सबसे कर एक नया ही प्रयोग हुआ है, उसे विश्व-शांति कल्याण के लिये अणु सत्ता का उपयोग की संज्ञा दी जा सकती है। उसमें ऐसी संचार और ग्रहण व्यवस्था की गई है, जिसकी सहायता से दुनियाँ के किसी भी डडडड बैठे मनुष्य को देखना, बातचीत करना आदि सम्भव हो जायेगा। अभी विशेष प्रग्रहण केन्द्रों (रिसीविंग स्टेशन्स) के माध्यम से ही यह व्यवस्था सम्भव होगी पर टेल-स्टार का विस्तृत अध्ययन एक दिन मनुष्य-मनुष्य के बीच बेतार-के-तार की तरह का सम्बन्ध सूत्र बन जायेगा, ऐसी सम्भावना उसके निर्माता डॉ. पियर्स ने स्वयं ही व्यक्त की है।
टेल-स्टार एक प्रकार का चक्र है, जिसमें भीतर तो वैज्ञानिक उपकरण है और बाहर सन्देश प्रेषित (ट्रांसमीटर) और ग्रहण (रिसीव) करने वाली विचित्र प्रणाली का अंकन किया गया है। इसमें गहरे रंग की 3600 वर्ग और सेल (वह बैटरियाँ जो सूर्य की ऊर्जा से चलती है) और भीतर पट्टियों की तरह की एण्टेना है’ ऊपर वाली पट्टी 6390 मेगासाइकिल्स पर सन्देश ग्रहण करती है, अर्थात् इस फ्रीक्वेंसी पर कहीं से भी प्रेषित समाचार या वृत्तचित्र को वह ग्रहण कर लेगी और निचली पट्टी 4170 मेगासाइकिल से उस सन्देश या चित्र को सारी सृष्टि में फैला देगी। पिछले दिनों अन्तरिक्ष यात्री कूपर की यात्रा की अमेरिका के अतिरिक्त इंग्लैण्ड, फ्राँस, जर्मनी आदि कई देशों में दिखाया गया, वह टेल-स्टार की सहायता से ही था।
टेल-स्टार की तकनीकी (टेक्निकल) रचना मानव शरीर से कम आश्चर्यजनक नहीं है। जिस प्रकार हमारे शरीर में 72 हजार नाड़ियों का जाल बिछा है और वह सब कुछ ऐसे शक्ति केन्द्रों (कोष या चक्रों) उपकेन्द्रों से सम्बद्ध हैं, जहाँ की शक्ति से इन नाड़ियों के माध्यम से बाह्य और अन्तर जगत् से सम्बन्ध और सामंजस्य स्थापित होता है। शरीर के एक स्थान की प्रतिक्रिया दूसरे अंगों पर होती है, वह इन नाड़ियों के माध्यम से होती हैं, उसे विशेष शक्ति कोषों की अस्तर अनुभूति (सेल्फ रियलाइजेशन) कह सकते हैं, उसी प्रकार टेलस्टार में भी हजारों ग्रहण और प्रेषण (रिसीविंग एण्ड ट्रान्समिसिंग) प्रणालियाँ रखी गई है, जिससे उन्हें विश्व के किसी भी भाग में सुना और देखा जा सके।
टेलस्टार का कुल वजन 170 पौण्ड और व्यास केवल 34 इंच है, जिस तरह एक बालक किसी पतंग को मजे से आकाश में उड़ा लेता है, उसी प्रकार टेलस्टार को अन्तरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर दिया जाता है। वहाँ से अपना काम प्रारम्भ कर देता है। अभी इसे केवल अमेरिका की बैल टेलीफोन प्रयोगशाला ने तैयार किया। उसे छोड़ने के लिये एण्डोवर नामक स्थान में एक विशाल एण्टेना निर्मित किया गया है। अभी केवल यूरोप में ही कुछ ऐसे केन्द्र स्थापित हुए है, जो इस संचार व्यवस्था का लाभ उठा रहे हैं पर वह दिन दूर नहीं जब इसकी सहायता से चन्द्रमा और शुक्र आदि ग्रहों में पहुँचे लोगों से भी बातचीत करने में सहायता मिलेगी।
‘टेलस्टार’ की मुख्य भूमिका यह है कि वह धरती के प्राप्त संकेतों को दस अरब गुना शक्ति बढ़ा देता है और फिर उस बढ़ी हुई शक्ति से उस सन्देश को धरती की ओर प्रेषित करता है। उपग्रह से संकेत भेजने की शक्ति ढाई वाट की है, जो पृथ्वी पर आने तक घटकर अरबों हिस्से के बराबर रह जाती हे। इस कारण सामान्य स्तर पर उसे सुना जाना सम्भव नहीं होता, इसलिये एण्डोवर (स्थान का नाम) 177 फूट ऊँचा एण्टीना (उपग्रह संचार-केन्द्र बनाया गया। यह संकेतों की आवाज को फिर बढ़ा देता है, जिससे सामान्य संचार व्यवस्था का कार्यक्रम चलने लगता है, अर्थात् एण्डोवर की फ्रीक्वेंसी पर यूरोप के (अभी) सभी देश अपने रेडियो और टेलीविजन सेटों पर सुन और देख लेते है। बाद में वह व्यवस्था सारे संसार के लिये उपलब्ध हो जायेगी।
इस व्यवस्था पर भारी व्यय लगता है। 30 लाख डालर की धनराशि केवल एक बार के प्रयोग में व्यय होती है। इतना व्यय हर बार उपग्रह भेजने पर उठाना पड़ता है। फिर यहाँ पृथ्वी में अनेक एण्टीना स्थापित करने का व्यय भी बहुत अधिक है। अमेरिका में 177 फुट का विशाल एण्टीना बना है, उसका 370 टन भार है और डिग्री के बीसवें भाग तक नियन्त्रण कर सकता है, का निर्माण व्यय कई करोड़ डालर तक बैठा है, इसलिये यह व्यवस्था सब के लिये सम्भव नहीं। इंग्लैण्ड में ‘गूनहिली डाउन्स’, फ्राँस में ब्रिटोनी और पश्चिम जर्मनी में म्यूनिख के बाहर बिल्हेम में ही एण्टीना निर्मित होने की सम्भावनायें है, शेष देश तो अभी उसकी प्रारम्भिक जानकारी जुटाने में ही संलग्न है। सभी देशों में व्यवस्थायें हो जायेंगी तो एक महाद्वीप का दूसरे महाद्वीप से संचार का सीधा सम्बन्ध जुड़ जायेगा और तब अन्तरिक्ष यात्रियों के सन्देश, उनके चित्र आदि भी यहाँ उतने ही साफ देखे और सुने जा सकेंगे।
11 जुलाई 1962 को पहला टेलस्टार आकाश में स्थापित किया गया। जब वह एण्डीवर की एण्टीना से उड़कर अपने नियत स्थान पर चक्कर लगाने लगा। 25 टन वजन और नकली रबर मिले डेक्रोन तन्तुओं से बने एण्डोवर एण्टीना ने आध घण्टे में ही सन्देश अमेरिका के उपराष्ट्रपति टेलीफोन हाथ में लेकर खड़े थे। इधर फ्रैड कैपेल एण्डोवर से बोल-” आप जानते होंगे कि यह आवाज टेलस्टार उपग्रह द्वारा प्रसारित की जा रही है, आपको आवाज कैसी सुनाई दे रही है। उधर से उपराष्ट्रपति ने अभिवादन का उत्तर इन शब्दों में दिया- “मि० कैपेल, आपकी बिल्कुल साफ सुनाई दे रही है।” यह उद्घाटन थ इसके बाद लाखों अमेरिकियों न सारे पेरिस को अपने टेलीविजनों में देखा। वहाँ की प्रत्येक वस्तु साफ ऐसे ही दिखाई दे रही थी, जैसे कोई आकाश में बैठकर विस्तृत भूभाग का दृश्य देख रहा हो। पेरिस का संगीत दृश्य और स्वर बिल्कुल स्पष्ट और साफ सुने गये। फिर इंग्लैण्ड का कार्यक्रम दिखाया गया। टेलस्टार से अन्तरिक्ष की अनेक महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ मिलने के भी समाचार मिले है। अनुमान है कि यह टेलस्टार दो-सौ वर्ष तक काम करता रहेगा।
इस अनुसन्धान से सामान्य जनता को अभी लाभ मिले भले ही न मिला हो पर लोग यह अनुभव कर रहे है कि ऐसी कोई सत्ता, जो टेलस्टार की तरह की सम्भावनाओं से परिपूर्ण हैं, मानव शरीर में हो सकती है क्या? यदि हाँ तो क्या उपनिषद् का वह अंश जो ऊपर प्रजापति ने देवताओं को सुनाया, उसी का संकेत तो नहीं है। यदि हाँ तो मनुष्य इस खर्चीली और जटिल यांत्रिक प्रक्रिया में क्यों पड़े। अपने आन्तरिक ‘टेलस्टारों’ का ही विकास क्यों न किया जाये?
वैज्ञानिक इस बात को मानते हैं कि यांत्रिक संचार और दूरदर्शन (टेलीविजन) प्रणाली शरीर की संचार और दर्शन प्रणाली का नमूना है, वे यह भी मानते ह। कि मनुष्य के मस्तिष्क में उठने वाले विचारों को भी एक नियत फ्रीक्वेंसी पर ग्रहण किया जा सकता ह पर उसके लिये भेजे जाने वाले सन्देशों की शक्ति टेलस्टार की तरह किसी अणु-शक्ति द्वारा बढ़ा दी जाये, उसी प्रकार ग्रहण करने वाला भी अपनी शक्ति को उतना बढ़ाने की वह हवा में तैरते हुये सन्देशों में से अपनी फ्रीक्वेंसी के सन्देश की शक्ति को बढ़ाकर ग्रहण कर लें। ऐसे चक्र ऐसे संस्थान जो 3600 बैटरियों की तरह उन विचारों को शक्ति दे सकें, शरीर में हैं केवल उनके विकास की आवश्यकता है, इसकी पुष्टि वैज्ञानिक संचार-उपग्रह टेलस्टार से कर रहें हैं।
जिस दिन यह अभ्यास मनुष्य पूरा कर लेगा उस दिन मनुष्य-मनुष्य तो क्या सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक बिन्दु पर आ जायेगा। तब न कोई कष्ट होगा। न कोई अभाव, न किसी की प्रेम पीड़ा और न कोई अज्ञान। भले ही अभी इस तरह के आध्यात्मिक विकास में कुछ समय लगे।
एक साधु थे, योग साधना करते थे और प्रतिदिन सायंकाल ग्रामवासियों को एकत्रित कर उन्हें ज्ञान दान भी दिया करते थे। साधु का ही प्रभाव था कि गाँव में न कोई चोरी करता था और न छल-कपट ईर्ष्या-द्वेष और बेईमानी। सब लोग प्रेमपूर्वक रहते थे।
एक दिन गाँव के कुछ मनचले लड़कों को शरारत सूझी। कई लड़के इकट्ठा होकर साधु के पास गये और बोले- महात्मन्! अपने गाँव के पास जो गंगा जी का पुल है, नाराज हो गया हे, कहता है, मुझे दस हजार रुपये दो तो रुकूँगा, नहीं कहीं दूर चला जाऊँगा हम लोगों ने बहुत मनाया, मानता ही नहीं। हारकर गाँव वाले चन्दा इकट्ठा कर रहें हैं। खुद आप भी दान दीजिये।
साधु ने ध्यान से सब बात सुनि बच्चों की ओर देखा- थोड़ा मुस्कराए, भीतर कुटी में गये और पाँच रुपये लाकर लड़कों को देते हुये बोले- “लो शीघ्र जाओ और पुल को कहीं बाहर जाने से रोको।”
लड़के तब तो चले गये पर दूसरे दिन आकर उन्होंने भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और पूछा- “महाराज! आप तो इतने ज्ञानी हैं, फिर आप इतना भी नहीं समझ सके कि पुल भी कहीं रुकता है?”
साधु हँसे और बोले- “बेटा! वह तो मैं भी समझ गया था पर आप लोगों की परोपकार की भावना की रक्षा तो करनी थी।”
बालक बहुत संतुष्ट हुये ओर उस दिन से सच्चे मन से परोपकार करना प्रारम्भ कर दिया

स्वर का स्वास्थ्य पर प्रभाव :-


जिस समय जो स्वर चलता है उस समय तुम्हारे शरीर में उसी स्वर का प्रभाव होता है। हमारे ऋषियों ने इस विषय बहुत सुंदर खोज की है।
दायें नथुने से चलने वाला श्वास दायाँ स्वर एवं बायें नथुने से चलने वाला श्वास बायाँ स्वर कहलाता है, जिसका ज्ञान नथुने पर हाथ रखकर सहजता से प्राप्त किया जा सकता है। जिस समय जिस नथुने से श्वासोच्छ्वास अधिक गति से चल रहा हो, उस समय वह या नथुना चालू है ऐसा कहा जाता है।
जब सूर्य नाड़ी अर्थात् दायाँ स्वर (नथुना) चलता हो तब भोजन करने से जल्दी पच जाता है लेकिन पेय पदार्थ पीना हो तब चन्द्र नाड़ी अर्थात् बायाँ स्वर चलना चाहिए। यदि पेय पदार्थ पीते समय बायाँ स्वर न चलता हो तो दायें नथुने को उँगली से दबा दें ताकि बायाँ स्वर चलने लगे। भोजन या कोई भी खाद्य पदार्थ सेवन करते समय पिंगला नाड़ी अर्थात् सूर्य स्वर चालू न हो तो थोड़ी देर बायीं करवट लेटकर या कपड़े की छोटी पोटली बायीं काँख में दबाकर यह स्वर चालू किया जा सकता है। इससे स्वास्थ्य की रक्षा होती है तथा बीमारी जल्दी नहीं आती।
सुबह उठते समय ध्यान रखें कि जो स्वर चलता हो उसी ओर का हाथ मुँह पर घुमाना चाहिए तथा उसी ओर का पैर पहले पृथ्वी पर रखना चाहिए। ऐसा करने से अपने कार्यों में सफलता मिलती है ऐसा कहा गया है।
दायाँ स्वर चलते समय मलत्याग करने से एवं बायाँ स्वर चलते समय मूत्रत्याग करने से स्वास्थ्य की रक्षा होती है। वैज्ञानिकों ने प्रयोग करके देखा कि इससे विपरीत करने पर विकृतियाँ उत्पन्न होती हैं।
प्रकृति ने एक साल तक के शिशु के स्वर पर अपना नियंत्रण रखा है। शिशु जब पेशाब करता है तब उसका बायाँ स्वर चलता है और मलत्याग करता है तब उसका दायाँ स्वर चलता है।

लघुशंका बैठकर ही करनी चाहिए क्योंकि खड़े-खड़े पेशाब करने से धातु क्षीण होती है और बच्चे भी कमजोर पैदा होते हैं।
कुछ लोग मुँह से श्वास लेते हैं। इससे श्वासनली और फेफड़ों में बीमारी के कीटाणु घुस जाते हैं एवं तकलीफ सहनी पड़ती है। अतः श्वास सदैव नाक से ही लेना चाहिए।
कोई खास काम करने जायें उस वक्त जो भी स्वर चलता हो वही पैर आगे रखकर जाने से विघ्न दूर होने में मदद मिलती है। इस प्रकार स्वर का भी एक अपना विज्ञान है जिसे जानकर एवं छोटी-छोटी सावधानियाँ अपना कर मनुष्य अपने स्वास्थ्य की रक्षा एवं व्यावहारिक जीवन में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।

Wednesday 23 March 2016

दान का स्वरूप :-


हमारी वैदिक संस्कृति में त्याग, सेवा, सहायता, दान तथा परोपकार को सर्वोपरि धर्म के रूप में निरुपित किया गया है, क्योकि वेद में कहा गया है – ‘शतहस्त समाहर सहस्त्र हस्त सं किर१अर्थात् सैकड़ों हाथों से धन अर्जित करो और हजारों हाथों से दान करो।
गृहस्थों, शासकों तथा सम्पूर्ण प्राणी मात्र को वैदिक वाङ्मय में दान करने का विधान किया गया है। ‘दक्षिणावन्तो अमृतं भजन्ते२ , ‘न स सखा यो न ददाति सख्ये३ , पुनर्ददताघ्नता जानता सं गमेमहि४, शुद्धाः पूता भवत यज्ञियासः५ इत्यादि अनेक मन्त्रों में दान की महिमा का विस्तृत वर्णन किया गया है।
दान लेना ब्राह्मणों का शास्त्रसम्मत अधिकार है परन्तु वहीं यह भी निरुपित किया गया है कि दान सुपात्र को दिया जाए, जिससे कोई दुरुपयोग न हो सके।
प्रतिग्रहीता की पात्रता पर विशेष बल देते हुए याज्ञवल्क्य जी कहते है कि-सभी वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, ब्राह्मणों में भी वेद का अध्ययन करने वाले श्रेष्ठ हैं, उनमें भी श्रेष्ठ क्रियानिष्ठ है और उनसे भी श्रेष्ठ आध्यात्मवेत्ता ब्राह्मण है।
न केवल विद्या से और न केवल तप से पात्रता आती है अपितु जिसमें अनुष्ठान, विद्या और तप हो वही दान ग्रहण करने का सत्पात्र होती है।

न विद्यया केवला तपसा वापि पात्रता।
यत्र वृत्तमिमे चोभे तद्धि पात्रं प्रकीर्तितम्।। ६
दान के सम्पूर्ण फल की प्रप्ति सत्पात्र को दान देने से ही प्राप्त होती है। अतः आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले को चाहिए कि वह अपात्र को दान कदापि न दे, क्योंकि

गोभूतिहिरण्यादि पात्रे दातव्यमर्चितम्।
नापात्रे विदुषा किंचिदात्मनः श्रेय इच्छता।।७
जिस समय जिस व्यक्ति को जिस वस्तु की आवश्यकता है, उस समय उसे वही वस्तु देनी चाहिए। यदि जो मनुष्य इस प्रकार दान देते है तो उनको वेद कहता है कि –
‘एतस्य वाऽक्षरस्य शासने ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति८
ऐसे दान देने वाले मनुष्य इस परमपिता परमेश्वर के शासन में सदैव प्रशंसा को प्राप्त होते है। गीता में श्रीकृष्ण जी महाराज कहते है कि –

यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणम्।।९
यज्ञ, दान तथा तप इन तीन सत्कर्मों को कदापि नहीं छोड़ना चाहिए। यज्ञ, दान, तप मनुष्यों को पवित्र व पावन बनाने वाले हैं। श्रद्धा एवं सामथ्र्य से दान के सत्य स्वरूप को जानकर किया गया दान लोक-परलोक दोनों में ही कल्याण करने वाला होता है।
जब यदि मन में धन संग्रह की प्रवृत्ति जागृत हो गई तो समझो वो अपने मुख्य उद्देश्य को छोड़कर अन्यत्र किसी अन्य लक्ष्य की ओर आकृष्ट हो गया है।

इसीलिए कहा गया है कि-
वृत्तिसप्रोचमन्विच्छेन्नेहेत धनविस्तरम्।
धनलोभे प्रसक्तस्तु ब्राह्मण्यादेव हीयते।।१॰
ब्राह्मण को भी अपनी आवश्यकता पूर्ति लायक धन ही दान स्वरूप लेना चाहिए। धन-संग्रह का लोभ नहीं करना चाहिए। अब यह जानने की आवश्यकता है कि दान में कौन-सी वस्तु देनी चाहिए।
जब हम वैदिक वाङ्मय में निहारते है तो हमें ज्ञात होता है कि – जिस व्यक्ति को जिस समय, जिस वस्तु की आवश्कता हो, उसे उस समय उसी वस्तु का दान देना चाहिए।
दान की यदि कोई सच्ची पात्रता है तो वो है जिसे यथोचित समय पर यथोचित पदार्थ मिले, जैसे कोई भूखा हो तो उसे भोजनादि से तृप्त करना चाहिए,
प्यासे को पानी पिलाना चाहिए, वस्त्रहीन को वस्त्र देने चाहिए, रोगी को ओषधी देनी चाहिए, विद्याभ्यासी को विद्या का दान कराना चाहिए इत्यादि परन्तु लिप्सता नहीं होनी चाहिए।
इसी प्रसंग में एक दृष्टांट उद्धृत कर रही हूं-
एक दिन एक व्यक्ति महात्मा गाॅंधी के पास अपना दुखडा लेकर पहुंचा। उसने गांधी जी से कहा-बापू! यह दुनिया बड़ी बेईमान है। आप तो यह अच्छी तरह जानते हैं कि मैंने पचास हजार रूपये दान देकर धर्मशाला बनवायी थी पर अब उन लोगों ने मुझे ही उसकी प्रबन्धसमिति से हटा दिया है।
धर्मशाला नहीं थी तो कोई नहीं था, पर अब उस पर अधिकार जताने वाले पचासों लोग खड़े हो गये हैं। उस व्यक्ति की बात सुनकर बापू थोड़ा मुस्कराये और बोले-भाई, तुम्हें यह निराशा इसलिये हुई कि तुम दान का सही अर्थ नहीं समझ सके।
वास्तव में किसी चीज को देकर कुछ प्राप्त करने की आकांक्षा दान नहीं है। यह तो व्यापार है। तुमने धर्मशाला के लिये दान तो दिया, लेकिन फिर तुम व्यापारी की तरह उससे प्रतिदिन लाभ की उम्मीद करने लगे।
वह व्यक्ति चुपचाप बिना कुछ बोले वहां से चलता बना। उसे दान और व्यापार का अन्तर समझ में आ गया।

अब हमें यह जानना चाहिए कि दान कैसे करना चाहिए इसके लिए तैत्तिरीयोपनिषद् में अवलोकन करते हैं कि
‘श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया देयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्।११
जो कुछ भी दान में दिया जाये श्रद्धापूर्वक दिया जाना चाहिए । क्योंकि बिना श्रद्धा के किये हुए दान असत् माना गया है-

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।१२

श्रद्धा पूर्वक देना चाहिये क्योंकि सारा धन तो उस परमपिता परमेश्वर का ही है। इसलिए उनकी सेवा में धन लगाना मेरा कर्तव्य है। जो कुछ मैं दान कर रहा हूं वह थोड़ा है, इस संकोच से दान देना चाहिये। अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार देना चाहिये।
भय के कारण भी दान देना चाहिए परन्तु जो कुछ भी दिया जाय विवेकपूर्वक निष्काम भाव से कर्तव्य समझ कर देना चाहिए।
‘दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे’१३
इस प्रकार दिया गया दान परमपिता परमेश्वर को प्राप्त करने में अर्थात् मोक्ष प्राप्त करने में सहायक बन जाता है।
कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि यज्ञ, दान आदि पुण्ययुक्त कर्मों को करने से हम दरिद्र हो जाते है, हमारा धन, वैभव समाप्त हो जाता है तो मैं उन लोगों से कहना चाहूँगी कि दान करने से धन एवं विद्या की निरन्तर वृद्धि होती है, क्योकि शास्त्रों में कहा गया है कि-

मूर्खो हि न ददात्यर्थानिह दारिद्रî शंकया।
प्राज्ञस्तु विसृजत्यर्थानमुत्र तस्य ननु शंकया।।१४
अर्थात् दान देने से धन समाप्त हो जाऐगा या दरिद्रता आयेगी यह तो मूर्खों की सोच होती है। मूर्ख लोग दरिद्रता की आशंका में वशीभूत होकर दान न देकर पुण्य से वंचित रहते है और सदैव दुखों को भोगते रहते हैं।

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत् प्रशस्यते।।
दरिद्रता को दूर करने का अमोघ शस्त्र है दान। दरिद्रता आदि दुःखों से दूर रहने का यहीं एकमात्र साधन है। दानशील पुरुष या स्त्री किसी भूखे, प्यासे, तिरस्कृतों का पालन-पोषण करके उन्हे तृप्त करते है तो वो सदा प्रसन्नता को प्राप्त करते है। वे सदा ही अपने जीवन में आनन्दित रहते है।

दानं भोगो नाशस्तिस्त्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति।।१५

धन की तीन गतियां होती है – दान, भोग और नाश। जो व्यक्ति धन का दान व भोग नहीं करता उसकी तीसरी गति अर्थात् नाश होती है।
हमारे शास्त्रों में धन की सबसे अच्छी गति दान है। दान देने से हमारा धन पात्र के पास पहुंच गया और उसकी जरुरी आवश्यकता पूर्ण हो गई। इसीलिए यह श्रेष्ठ गति है।
अगर हम दान न देकर उसका भोग करेंगे तो आवश्यक-अनावश्यक कर्मों में व्यय होगा। यदि खर्च ही नहीं करेंगे तो तीसरी गति अर्थात् नाश को प्राप्त होगा।
जैसे-जूए में हार जाना, चोरी हो जाना आदि। अतः सर्वोत्तम गति दान ही सिद्ध होती है। क्योंकि दान के माध्यम से अत्यन्त आवश्यकता वाले के उद्देश्य की पूर्ति होती है।

इसप्रकार दान देना हमारा कर्तव्य कर्म है-यह समझकर देना चाहिए। जहां जब एवं जिस वस्तु की आवश्यकता हो तब दिया जाय एवं देश, काल तथा परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए सुपात्र को ही दिया जाये।

सन्दर्भ सूची:-
१. ऋग्वेद-३.२४.५।
२. ऋग्वेद-१.१२५.६।
३. ऋग्वेद-१॰.११७.४।
४. ऋग्वेद-५.५१.१५।
५. ऋग्वेद-१॰.१८.२।
६. याज्ञ.स्मृ.आ.२॰॰।
७. याज्ञ.स्मृ.आ.२॰१।
८. वेद।
९. गीता-१८.५।
१॰. कूर्मपुराण।
११. तैत्तिरीयोपनिषद्-१.११।
१२. गीता-१७.२८।
१३. गीता-१७.२॰।
१४. स्कन्दपुराण-२.६३।
१५. पंचतन्त्र।

|| वेद ||

|| वेद ||
ऋग्वेद
यजुर्वेद
सामवेद
अथर्ववेद
उपनिषद्
ऋग्वेद
ऋग्वेद सनातन धर्म अथवा हिन्दू धर्म का स्रोत है । इसमें १०१७ सूक्त हैं, जिनमें देवताओं की स्तुति की गयी है ।
इसमें देवताओं का यज्ञ में आह्वान करने के लिये मन्त्र हैं — यही सर्वप्रथम वेद है । ऋग्वेद को दुनिया के सभी इतिहासकार हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की सबसे पहली रचना मानतेहैं।ये दुनिया के सर्वप्रथम ग्रन्थों में से एकहै।
यजुर्वेद की निम्‍नांकित दो शाखाएं हैं–
कृष्ण यजुर्वेद (दक्षिण भारत)
शुक्ल यजुर्वेद (उत्तर भारत)
इसमे कर्मकाण्ड के कई यज्ञों का विवरण हैः
अग्निहोत्र
अश्वमेध
वाजपेय
सोमयज्ञ
राजसूय
अग्निचयन आयुर्वेद आयुर्विज्ञान की प्राचीन भारतीय पद्धति है। यह आयु का वेद अर्थात आयु का ज्ञान है। जिस शास्त्र के द्वारा आयु का ज्ञान कराया जाय उसका नाम आयुर्वेद है।
शरीर, इन्द्रिय सत्व, और आत्मा के संयोग का नाम आयु है। आधुनिक शब्दों में यही जीवन है। प्राण से युक्त शरीर को जीवित कहते है। आयु और शरीर का संबंध शाश्वत है। आयुर्वेद में इस सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
फलस्वरुप वह भी शाश्वत है। जिस विद्या के द्वारा आयु के सम्बन्ध में सर्वप्रकार के ज्ञातव्य तथ्यों का ज्ञान हो सके या जिस का अनुसरण करते हुए दीर्घ आशुष्य की प्राप्ति हो सके उस तंत्र को आयुर्वेद कहते हैं, आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है।
यह मनुष्य के जीवित रहने की विधि तथा उसके पूर्ण विकास के उपाय बतलाता है, इसलिए आयुर्वेद अन्य चिकित्सा पद्धतियों की तरह एक चिकित्सा पद्धति मात्र नही है, अपितु सम्पूर्ण आयु का ज्ञान है।
आयुर्वेद में आयु के हित (पथ्य, आहार, विहार), अहित (हानिकर, आहार, विहार), रोग का निदान और व्याधियों की चिकित्सा कही गई है। हित आहार, सेवन एवं अहित आहार त्याग करने से मनुष्य पूर्ण रुप से स्वस्थ रह सकता है।
आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन के चरम लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।
पुरुषार्थ चतुष्टयं की प्राप्ति का मुख्य साधन शरीर है अतः उसकी सुरक्षा पर विशेष बल देते हुए आयुर्वेद कहता है कि धर्म अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति का मुख्य साधन शरीर है। सम्पूर्ण कार्यों विशेष रुप से शरीर की रक्षा करना चाहिए।
भाव प्रकाश, आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ, मे कहा गया है कि जिस शास्‍त्र के द्वारा आयु का ज्ञान, हित और अहित आहार विहार का ज्ञान, व्‍याधि निदान तथा शमन का ज्ञान प्राप्ति किया जाता है, उस शास्‍त्र का नाम आयुर्वेद है।
आयुर्वेद के इतिहास पर यदि अवलोकन किया जाय तो इसकी उत्‍पत्ति महर्षि देवता ब्रह्मा जी द्वारा माना गया है, जिन्होंने ब्रह्मसंहिता की रचना की थी। कहा जाता है कि ब्रह्मसंहिता में दस लाख श्‍लोक तथा एक हजार अघ्‍याय थे, लेकिन आधुनिक काल में यह ग्रंथ उपलब्‍ध नहीं है।
आयुर्वेद के ज्ञान के आदि श्रोत वेद मानें जाते हैं। यद्यपि आयुर्वेद का वर्णन सभी चारों वेदों में किया गया है, लेकिन अथर्ववेद से अधिक साम्‍यता होंनें के कारण महर्षि सुश्रुत नें उपांग और महर्षि वाग्‍भट्ट नें उपवेद बताया है। महर्षि चरक नें भी अथर्ववेद से सबसे अधिक नजदीकी विवरण मिलनें के कारण आयुर्वेद को इसी वेद से जोडा है।
इसी कडी में, ऋग्वेद में आयुर्वेद को उपवेद की संज्ञा दी गयी है। महाभारत में भी आयुर्वेद को उपवेद कहा गया है। पुराणों में भी वर्णन प्राप्‍त है।
ब्रह्मवैवर्तपुराण में आयुर्वेद को पांचवां वेद कहा गया है। वास्‍तव में किसी भी वैदिक साहित्‍य में आयुर्वेद शब्‍द का वर्णन नहीं मिलता, फिर भी महर्षि पाणिनि द्वारा रचित ग्रंथ अष्‍टाध्‍यायी में आयुर्वेद शब्‍द प्राप्‍त होता है।
आयुर्वेद का सम्‍पूर्ण वर्णन प्रमुख रूप से चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में किया गया है। अन्‍य संहिताओं यथा काश्‍यप संहिता, हरीत संहिता, में इसका वर्णन किया गया है, लेकिन ये सम्‍पूर्ण नहीं हैं।
अष्टाङ्ग संग्रह, अष्टाङ्ग हृदय, भाव प्रकाश, माधव निदान इत्‍यादि ग्रंथों का सृजन चरक और सुश्रुत को आधार बनाकर रचित की गयीं हैं।
समय के परिवर्तन के साथ साथ निदानात्‍मक और चिकित्‍सकीय अनुभवों को लेखकों नें अपने अपने दृष्टिकोणों और विचारों को अनुकूल समझ कर संस्‍कृत भाषा में लिपिबद्ध किया।
आयुर्वेद का उद्देश्य:-
संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो दुःखी होना चाहता हो। सुख की चाह प्रत्येक व्यक्ति की होती है, परन्तु सुखी जीवन उत्तम स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। स्वस्थ और सुखी रहने के लिए यह आवश्यक है कि शरीर में कोई विकार न हो और यदि विकार हो जाए तो उसे शीघ्र दूर कर दिया जाये।
आयुर्वेद का मुख्य लक्ष्य व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना एवं रोगी हो जाने पर उसके विकार का प्रशमन करना है। ऋषि जानते थे कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति स्वस्थ जीवन से ही है इसीलिए उन्होंने आत्मा के शुद्धिकरण के साथ शरीर की शुद्धि व स्वास्थ्य पर भी विशेष बल दिया है।
आयुर्वेद के विकास क्रम और विकास के इतिहास पर दृष्टिपात करनें से ऐसा समझा जाता है कि आदिम काल के पूर्वजों नें रोंगों से मुक्ति पानें के लिये जिन जंगली जड़ी-बूटियों, रहन-सहन और अन्‍य पदार्थों को रोगानुसार आरोग्‍यार्थ स्‍वरूप में स्‍वीकार किया, वे यह सारा ज्ञान अपनें बाद की पीढियों को देते चले गये।
यह सारा ज्ञान श्रुति और स्‍मृति पर आधारित रहा। कालान्‍तर में यह ज्ञान एक स्‍थान पर एकत्र होता गया। जब गुरूकुलों की स्‍थापना हुयी तो धर्म, कर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इत्‍यादि की प्राप्ति के लिये यह कहा गया कि जब तक तन और मन स्‍वस्‍थ्य नहीं होंगे, ऐसा उद्देश्‍य प्राप्‍त करना कठिन है, इसलिये पहली आवश्‍यकता शरीर को स्‍वस्‍थ्‍य बनाये रखना है।
जब तक लिपि का आविष्‍कार नहीं हुआ था तब तक यह ज्ञान स्‍मृति और श्रुति के सहारे जीवित रहा। जब लिपियों का आविष्‍कार हुआ तब यह ज्ञान पत्‍थरों से लेकर भोजपत्र में संचित करके रखा गया।
आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थ :-

ग्रन्थ रचनाकार
चरक संहिता चरक
सुश्रुत संहिता सुश्रुत
अष्टांग हृदय वाग्भट्ट
वंगसेन वंगसेन
माधव निदान मधवाचार्य
भाव प्रकाश भाव मिश्र
इन ग्रन्थों के अतिरिक्त वैद्य विनोद, वैद्य मनोत्सव, भैषज्य रत्नावली, वैद्य जीवन आदि अन्य वैद्यकीय ग्रन्थ हैं। वैद्य जीवन के रचयिता पंडितवर लोलिम्बराज हैं; इस ग्रन्थ को अतीत में एवं आधुनिक काल में अधिक श्रद्धा के साथ वैद्यों ने अपनाया है।
आयुर्वेद अवतरण :-

आयुर्वेद के अवतरण की कई गाथायें हैं :
चरक संहिता के अनुसार ब्रह्मा जी नें आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति को दिया, दक्ष प्रजापति नें यह ज्ञान दोनों अश्विनी कुमार को दिया, अश्‍वनी कुमारों नें यह ज्ञान इन्‍द्र को दिया, इन्‍द्र नें यह ज्ञान भारद्वाज को दिया, भारद्वाज नें यह ज्ञान आत्रेय पुनर्वसु को दिया, आत्रेय पुनर्वसु नें यह ज्ञान अग्निवेश, जतूकर्ण, भेल, पराशर, हरीत, क्षारपाणि को दिया ।
सुश्रुत संहिता के अनुसार ब्रम्‍हा जी नें आयुर्वेद का ज्ञान दक्षप्रजापति को दिया, दक्ष प्रजापति नें यह ज्ञान अश्‍वनीं कुमार को दिया, अश्‍वनी कुमार से यह ज्ञान धन्‍वन्‍तरि को दिया, धन्‍वन्‍तरि नें यह ज्ञान औपधेनव और वैतरण और औरभ और पौष्‍कलावत और करवीर्य और गोपुर रक्षित और सुश्रुत को दिया ।
काश्‍यप संहिता के अनुसार ब्रम्‍हा जी नें आयुर्वेद का ज्ञान अश्‍वनी कुमार को दिया और अश्‍वनीं कुमार नें यह ज्ञान इन्‍द्र को दिया और इन्‍द्र ने यह ज्ञान कश्‍यप और वशिष्‍ठ और अत्रि और भृगु आदि को दिया । इनमें से एक शिष्‍य अत्रि नें यह ज्ञान अपनें पुत्र और अन्‍य शिष्‍यों को दिया ।
सृष्टि के प्रणेता ब्रह्मा द्वारा एक लाख सूत्रों में आयुर्वेद का वर्णन किया गया और इस ज्ञान को दक्ष प्रजापति द्वारा ग्रहण किया गया तत्पश्चात् दक्ष प्रजापति से यह ज्ञान सूर्यपुत्र अश्विन कुमारों को और अश्विन कुमारों से स्वर्गाधिपति इन्द्र को प्राप्त हुआ।
आयुर्वेद के इतिहास से यह ज्ञात होता है कि इन्द्र के द्वारा यह ज्ञान पुनर्वसु आत्रेय को यह प्राप्त हुआ। शल्य शास्त्र के रुप में यह ज्ञान आदि धन्वन्तरि को प्राप्त हुआ। और स्त्री एवं बाल चिकित्सा के रुप में यह ज्ञान इन्द्र से महर्षि कश्यप को दिया गया।
उपरोक्त वर्णन से यह ज्ञात होता है कि भारत में प्रारंभ से ही चिकित्सा ज्ञान, काय चिकित्सा, शल्यचिकित्सा, स्त्री एवं बालरोग चिकित्सा रुप में विख्यात हुआ था। उपरोक्त इस विशेष कथन से यह बात भी प्रमाणित होती है कि चिकित्सा कार्य को करने के लिए आज की राज आज्ञा के अनुरुप चिकित्सा कार्य करने के लिए स्वर्गाधिपति इन्द्र से अनुमति प्राप्त करनी आवश्यक होती थी।
चरक संहिता को कश्‍मीर राज्‍य के आयुर्वेदज्ञ दृढ़बल नें पुर्नसंगृहित किया। इस समय के प्रसिद्ध आयुर्वेदज्ञों में मत्‍त, मान्‍डव्‍य, भास्‍कर, सुरसेन, रत्‍नकोष, शम्‍भू, सात्विक, गोमुख, नरवाहन, इन्‍द्रद, काम्‍बली, व्‍याडि आदि रहे हैं।
महात्‍मा बुद्ध के समय में आयुर्वेद विज्ञान नें सबसे अधिक प्रगति रस चिकित्‍सा विज्ञान और रस विद्या में किया है। इसी कारण बौद्ध युग को रस शास्‍त्र का स्‍वर्ण युग कहा जाता है।रस विद्या तीन भागों 1- धातु विद्या 2- रस चिकित्‍सा 3- क्षेम विद्या, में विभाजित हुयी ।
शल्‍य चिकित्‍सा पर प्रतिबन्‍ध :-
कलिंग विजय के पश्‍चात सम्राट अशोक नें भगवान बुद्ध के उपदेशों से प्रभावित होकर अपनें राज्‍य में रक्‍तपात और रक्‍तपात से संबंधित समस्‍त कार्यकलापों पर पूर्णत: प्रतिबन्‍ध लागू कर दिया।
इससें कालान्‍तर में शनै: शनै: आयुर्वेद में प्रचिलित शल्‍य-चिकित्‍सा का अभ्‍यास प्रभावित हुआ और अन्‍तत: एक प्रकार से शल्‍यचिकित्‍सा का लोप होता चला गया।
लेकिन दूसरी तरफ रस चिकित्‍सा में अदभुत रूप से प्रगति हुयी। केवल रसौषधियों के बल पर साध्‍य, कष्‍ट साध्‍य और असाध्‍य रोंगों की चिकित्‍सा विधियों की खोज की गयी।
बौद्ध युग के सिद्ध आयुर्वेदज्ञों में भगवान बुद्ध के शिष्‍य नागार्जुन तृतीय ने रस विद्या के उत्‍थान के लिये बहुत योगदान दिया। भगवान बुद्ध के शिष्‍यों में लगभग आठ नागार्जुन हुये हैं। ऐसा समझा जाता है कि आयुर्वेद रस-चिकित्‍सा विज्ञान के उत्‍थान और शोध में सभी नागार्जुनों का अमूल्‍य योगदान रहा है।

‘शिवताण्डवस्तोत्रम्’ के १७ वें और अन्तिम श्लोक में रावण इस श्लोक का माहात्म्य बताते हुए कहता है

 कि संध्या के समय पूजा के अनन्तर इस शिवभक्तिमय स्तोत्र का पाठ जो कोई शिव-पूजा-प्रवण जन करता है, उस भक्त को शिवजी श्रेष्ठ हाथी-घोड़ों से युक्त रथ तथा सदा स्थिर रहने वाली, शुभानना लक्ष्मी अर्थात विपुल वैभव प्रदान करते हैं ।
शिवताण्डवस्तोत्रम्
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवो शिवम्‌ ॥१॥
जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥२॥
धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥
जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदांधसिंधुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूतभर्तरि ॥४॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालयानिबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिङ्गभा निपीतपंचसायकंनमन्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥
नवीनमेघमंडलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥
प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥
अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमस्फुरद्धगद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकमस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥
कदा निलिंपनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥
॥ इति रावणकृतं शिव ताण्डव स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

शिव महिम्न स्तोत्र में रोहिणी, मृगशिरा तथा आर्द्रा नक्षत्र का रहस्य *

 *
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं।
गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा।।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममु।
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः।। २२।।
भावार्थ: एक बार प्रजापिता ब्रह्मा अपनी पुत्री वाणी पर ही मोहित हो गए। जब उनकी पुत्री ने हिरनी का स्वरुप धारण कर भागने की कोशिश की तो कामातुर ब्रह्मा भी हिरन भेष में उसका पीछा करने लगे।
हे शंकर ! तब आप ने व्याघ्र स्वरूप में धनुष-बाण ले ब्रह्मा को मार भगाया। आपके रौद्र रूप से भयभीत ब्रह्मा आकाश दिशा में अदृश्य अवश्य हुए परन्तु आज भी वह आपसे भयभीत हैं।
आकाश में आप देखेंगे रोहिणी नक्षत्र के रूप मे मृगीरूपधारी संध्या और उसके पीछे मृगशिरा नक्षत्र (मृगशिर के ३ तारे हैं व उनका रूप हिरणियों जैसा है) के रूप मे मृगरूपधारी ब्रह्मा जी और आर्द्रा नक्षत्र के रूप मे महादेव का बाण

मानव शरीर भी एक ब्रम्हांड ही है

बाह्य जगत की प्रतिकृति ये मानव शरीर भी एक ब्रम्हांड ही है और तदनुसार मानव शरीर में भी उत्तर और दक्षिण दो ध्रुव विराजमान हैं.जिनमे विद्युत चुम्बकत्व की धनात्मक और ऋणात्मक शक्ति प्रवाहित रहती है, मस्तिष्क को उत्तरी ध्रुव और मूलाधार को दक्षिण ध्रुव माना गया है.
इन्ही के मध्य मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध ,आज्ञा और सहस्रार चक्र हैं. अर्थात मूलाधार यदि एक छोर पर स्थित है तो सहस्रार दूसरे छोर पर स्थित है. और उस दिव्य शक्ति का आदान प्रदान मेरुदंड में स्थित सुषुम्ना सूत्र के द्वारा होता है.
सुषुम्ना पथ ही इन शक्तियों को परिष्कृत कर दोनों छोरो पर शक्ति का परस्पर आदान प्रदान करता है. जिन चक्रों की हमने बात की है .वे ७ चक्र वस्तुतः सप्त ऋषियों के प्रतिनिधि हैं.
अर्थात इन चक्रों में इन ऋषियों का ही तव प्रकाशित होता है, बाह्य दृष्टि से जो ऋषि हैं, वास्तव में वो सात शक्तियां और सात तत्व भाव हैं, जो जीवन के विभिन्न क्रिया कलापों को सुचारू रूप से संपन्न करने की क्षमता प्रदान करते हैं.
और ये भाव ,ये तत्व सूर्या से ही प्राण को ग्रहण करते हैं ,तभी उनमे जीवन की उपस्थिति हो पाती है. अब ये साधक के ऊपर निर्भर करता है की वो उपरोक्त सप्त शक्तियों का (जो की सूर्य से ही प्राणों का शोषण करते हैं और तदनुरूप साधक को दैदिप्यता और तेजस प्रदान करते ) कितना तीव्र प्रयोग कर पाता है. सबसे पहले ये समझ लेते हैं की वास्तव में ये सप्तर्षि हैं कौन कौन से और ये किन शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वशिष्ट – अग्नि तत्व – विवेक शक्ति
विश्वामित्र – आकाश तत्व – इच्छा शक्ति
भारद्वाज – चेतन तत्व – संकल्प शक्ति
गौतम – वायु तत्व – विचार शक्ति
जमदग्नि – तेज तत्व – क्रिया शक्ति
अत्री – जल तत्व – वाणी शक्ति
कश्यप – पृथ्वी तत्व – उत्थान शक्ति
वास्तव में ये सप्तर्षि ही मानव के वे सात शरीर या ब्रम्हांड के वे सात लोक हैं, जिन्हें भू,भुवः, स्वः मन:, जनः,तपः और सत्य लोक कहा गया है .
ये मानव शरीर में उपस्थित वो सात सम्भावनाये हैं की यदि इन्हें कोई चैतन्य कर ले ,फिर उसके लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं रह जाता है. वस्तुतः मानव शरीर में उपस्थित चेतना की ये सात परते ही हैं. जो किसी भी असाध्य को साध्य कर देती हैं.
और एक बात हृदयंगम करने योग्य है की यदि तंत्र का आश्रय लिया जाये तो निश्चित ही ,चेतना के इन सातो स्तर की प्राप्ति सहज हो जाती है. वस्तुतः सूर्य विज्ञानं के जिज्ञासुओं को या साधकों को इस रहस्य को आत्मसात कर सिद्ध हस्त प्राप्त करने के लिए तो पूरा एक साधना क्रम ही संपन्न करना पड़ता है.
परन्तु सामान्य क्रम अपनाकर भी हम कुंडलिनी के चक्रों को ना ही सिर्फ स्पंदित कर सकते हैं, अपितु सप्त ऋषियों की चेतना का ये स्पंदन आप अपने जीवन में उतार कर अपना भाग्य स्वतः ही लिख सकते हैं, और दुर्भाग्य को पूरी तरह मिटाकर एक सौम्यता और तेजोमयता की प्राप्ति कर सकते हैं.
किसी भी रविवार से इस साधना को आप प्रारंभ कर सकते हैं और प्रातः काल स्नान कर सूर्य को जब जल समर्पित करे तो उसके पहले जल पात्र की और दृष्टि रख कर निम्न मंत्र का १०८ बार उच्चारण करे, इसके बाद ही सूर्य को “ॐ तेजस्विताय नमः” कहकर जल अर्पित करे या अर्घ्य चढ़ाये –
मूल मन्त्र-ॐ सूर्य सूर्याय सूर्य सप्तर्षिभ्यो सह चैतन्य प्राप्तुम पूर्ण तेजस्विताय नमः II
वस्तुतः ये मन्त्र इस रूप में गुंथा हुआ है की यदि इसका उपरोक्त विधान से नित्य प्रति प्रयोग किया जाये तो निश्चित ही इसका प्रवाह आपके दुर्भाग्य को पूर्ण रूपेण दूर कर सकता है।

तंत्र क्या है?


तंत्र, तांत्रिक या टोने-टोटके का नाम सुनते ही हर आदमी के मन में एक जिज्ञासा उठती है कि आखिर यह तंत्र होता क्या है? तंत्र केवल अनिष्ट कार्यों के लिए ही नहीं होता बल्कि यह एक तरह की ऐसी विद्या है जो व्यक्ति के शरीर को अनुशासित बनाती है, शरीर पर खुद का नियंत्रण बढ़ाती है।
मोटे तौर पर देखा जाए तो तंत्र की परिभाषा बहुत सीधी और सरल है। सामान्य शब्दों में कहें तो तंत्र शब्द का अर्थ तन यानी शरीर से जुड़ा है।
ऐसी सिद्धियां जिन्हें पाने के लिए पहले तन को साधना पड़े या ऐसी सिद्धियां जिन्हें शरीर की साधना से पाया जाए, उसे तंत्र कहते हैं। तंत्र एक तरह से शरीर की साधना है।
एक ऐसी साधना प्रणाली, जिसमें केंद्र शरीर होता है। तंत्र शास्त्र का प्रारंभ भगवान शिव को माना गया है। शिव और शक्ति ही तंत्र शास्त्र के अधिष्ठाता देवता हैं। शिव और शक्ति की साधना के बिना तंत्र सिद्धि को हासिल नहीं किया जा सकता है।
तंत्र शास्त्र के बारे में अज्ञानता ही इसके डर का कारण हैं। दरअसल तंत्र कोई एक प्रणाली नहीं है, तंत्र शास्त्र में भी कई पंथ और शैलियां होती हैं। तंत्र शास्त्र वेदों के समय से हमारे धर्म का अभिन्न अंग रहा है। वेदों में भी इसका उल्लेख है और कुछ ऐसे मंत्र भी हैं जो पारलौकिक शक्तियों से संबंधित हैं इसलिए कहा जा सकता है कि तंत्र वैदिक कालीन है।
मंत्र साधनाओं एवं तंत्र के क्षेत्र में आज लोगों में रूचि बड़ी है, परन्तु फिर भी समाज में तंत्र के नाम से अभी भी भय व्याप्त है| यह पूर्ण शुद्ध सात्विक प्रक्रिया है, विद्या है| यह विडम्बना रही है, कि भारतीय ज्ञान का यह उज्ज्वलतम पक्ष अर्थात तंत्र से समाज भयभीत है|
समाज में आज बहुत ही ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जो भौतिक चिन्तन से ऊपर उठाकर साधनात्मक जीवन जीने की ललक रखते हैं| मात्र दैनिक पूजा या अर्चना से ही प्रसन्न हो जाते हैं, परन्तु उनमें दुर्लभ साधनाओं के प्रति बिल्कुल कोई लालसा नहीं है| पूजा एक अलग चीज है, साधना एक बिल्कुल अलग चीज है|
साधना केवल वही दे सकता है जो गुरु है| आज गाँव, नुक्कड़ में कई पुजारी मिल जायेंगे, पंडित मिल जायेंगे पर वे गुरु नहीं हो सकते, उनमें कोई साधनात्मक बल नहीं होता है|
वह पूजा, कर्मकांड मात्र एक ढकोसला है जिसमें समाज आज पुरी तरह फंसा है| यही कारण है कि व्यक्ति जीवन भर मन्दिर जाते हैं, सत्य नारायण की कथा तो कराते हैं, यज्ञ भी कराते हैं,
परन्तु उन्हें न तो किसी प्रकार की कोई साधनात्मक अनुभूति होती है और न ही किसी देवी या देवता के दर्शन ही होते हैं फिर भी वे स्वयं साधना के क्षेत्र में पदार्पण नहीं करते| यदि व्यक्ति इन्हें जीवन में स्थान दें, तो वह सब कुछ स्वयं ही प्राप्त कर सकता है|
तंत्र में मुख्यत ६ कार्य आते है…
१. वशीकरण: किसी निश्चित व्यक्ति से को अपने अनुकूल कर लेना और अपने इच्छित कार्य करवाना वशीकरण में आता है ।
२. मोहन : व्यक्तियों के पुरे समूह को अपने अनुकूल करना मोहन तंत्र के अन्तरगत आता है ।
३. विद्वेषण : किन्ही २ व्यक्तियों के बीच में भयंकर झगडा करवाना की वह दोनों आपस में मरने मारने को उतारू हो जाए ।
४. उच्चाटन : शत्रु का किसी विशेष कार्य से इस प्रकार मोह भंग कर देना की वह कार्य छोड़ दे उच्चाटन तंत्र के अन्तरगत माना गया है ।
५. स्तम्भन : शत्रुओ की बुद्धि, बल को को इस प्रकार से भ्रष्ट कर देना की वेह समझ ही ना पाए की क्या करना है और क्या नहीं ।
६. मारन : शत्रु को मार देना या मृत्यु तुल्ये कष्ट देना मारन में आता है ।

तांत्रिक सिद्धि में कुंआरी कन्या क्यों?
तंत्र शास्त्र के बारे में बहुत-सी भ्रांतियां प्रचलित हैं। विशेषत: पचं ‘मकार‘ साधना को लेकर, जिसमें मत्स्य,मदिरा, मुद्रा मैथुन आदि का वर्णन है। इसी कारण कुंआरी कन्या तथा मैथुन पर समय-समय पर आक्षेप लगते रहे हैं।
वस्तुत: इन शब्दों का अर्थ शाब्दिक न होकर गुप्त था जिसमें कुंआरी कन्या का महत्व नारी में अंतरनिहित चुंबकीय शक्ति (मैग्नेटिक फोर्स) से था।
नारी जितना पुरुष के संसर्ग में आती है वह उतनी ही चुंबकीय शक्ति का क्षरण करती जाती है। चुंबकीय शक्ति ही आद्याशक्ति है जिसे अंतर्निहित करके काम शक्ति को आत्मशक्ति में परिवर्तित किया जाता है। यह शक्ति दो केंद्रों में विलीन होती है।
प्रथमत: मूलाधार चक्र में, जहां से यह ऊर्जा जननेंद्रिय के मार्ग से नीचे प्रवाहित होकर प्रकृति में विलीन हो जाती है और यदि यही ऊर्जा भौंहों के मध्य स्‍थि‍त आज्ञा चक्र से जब ऊपर को प्रवाहित होती है तो सहस्रार स्‍थि‍त ब्रह्म से एकीकृत हो जाती है।
अत: कुंआरी कन्या का प्रयोग तांत्रिक उसकी शक्ति की सहायता से दैहिक सुख प्राप्त करने हेतु नहीं, ‍अपितु उसे भैरवी रूप में प्रतिष्ठित करके ब्रह्म से सायुज्य प्राप्त करने हेतु करता है।

तंत्र साधना में नारी क्यों है जरूरी…
ऋग्वेद के नासदीय सूक्त (अष्टक 8, मं. 10 सू. 129) में वर्णित है कि प्रारंभ में अंधकार था एवं जल की प्रधानता थी और संसार की उत्पत्ति जल से ही हुई है। जल का ही एक पर्यायवाची ‘नार’ है।
सृजन के समय विष्णु जल की शैया पर विराजमान होते हैं और नारायण कहलाते हैं एवं उस समय उनकी नाभि से प्रस्फुटित कमल की कर्णिका पर स्थित ब्रह्मा ही संसार का सृजन करते हैं और नारी का नाभि से ही सृजन प्रारंभ होता है तथा उसका प्रस्फुटन नाभि के नीचे के भाग में स्थि‍त सृजन पद्म में होता है।
सृजन की प्रक्रिया में नारायण एवं नारी दोनों समान धर्मी हैं एवं अष्टकमल युक्त तथा पूर्ण हैं जबकि पुरुष केवल सप्त कमलमय है, जो अपूर्ण है। इसी कारण तंत्र शास्त्र में तंत्रराज श्रीयंत्र की रचना में रक्तवर्णी अष्ट कमल विद्यमान होता है, जो नारी की अथवा शक्ति की सृजनता का प्रतीक है।
इसी श्रीयंत्र में अष्ट कमल के पश्चात षोडश दलीय कमल सृष्टि की आद्या शक्ति ‘चन्द्रा’ के सृष्टि रूप में प्रस्फुटन का प्रतीक है। चंद्रमा 16 कलाओं में पूर्णता को प्राप्त करता है।
इसी के अनुरूप षोडशी देवी का मंत्र 16 अक्षरों का है तथा श्रीयंत्र में 16 कमल दल होते हैं। तदनुरूप नारी 27 दिन के चक्र के पश्चात 28वें दिन पुन: नवसृजन के लिए पुन: कुमारी रूपा हो जाती है।
यह संपूर्ण संसार द्वंद्वात्मक है, मिथुनजन्य है एवं इसके समस्त पदार्थ स्त्री तथा पुरुष में विभाजित हैं। इन दोनों के बीच आकर्षण शक्ति ही संसार के अस्तित्व का मूलाधार है जिसे आदि शंकराचार्यजी ने सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में व्यक्त किया है।
शिव:शक्तया युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभवितुं।
न चेदेवं देवो न खलु कुशल: स्पन्दितुमपि।
यह आकर्षण ही कामशक्ति है जिसे तंत्र में आदिशक्ति कहा गया है। यह परंपरागत पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। तंत्र शास्त्र के अनुसार नारी इसी आदिशक्ति का साकार प्रतिरूप है। षटचक्र भेदन व तंत्र साधना में स्त्री की उपस्थिति अनिवार्य है, क्योंकि साधना स्थूल शरीर द्वारा न होकर सूक्ष्म शरीर द्वारा ही संभव है।

हिन्दी शब्द सागर संख्या 40 पृष्ठ 3749 में स्वर्ग के विषय में लिखा है

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”हिन्दुओं के सात लोकों में से तीसरा लोक जो ऊपर आकाश में द्युलोक से लेकर ध्रुव लोक तक माना जाता है, स्वर्ग कहलाता है। किसी पुराण अनुसार यह सुमेरु पर्वत पर है।
देवताओं का निवास स्थान यही-स्वर्ग लोक माना गया है, और कहा गया है कि जो लोग अनेक प्रकार के पुण्य और सत्कर्म करके मरते हैं, उनकी आत्माएँ इसी लोक में जाकर निवास करती हैं।
यज्ञ दान आदि जितने पुण्य कार्य किए जाते हैं, वे सब स्वर्ग की प्राप्ति के उद्देश्य से ही किए जाते हैं। कहते हैं कि इस लोक में केवल सुख ही सुख है, दु:ख, शोक, रोग मृत्यु आदि का नाम भी नहीं है।
जो प्राणी जितने ही अधिक सत्कर्म करता है, वह उतने ही अधिक समय तक इस लोक में निवास करने का अधिकारी होता है। परन्तु पुण्यों का क्षय हो जाने अथवा अवधि पूरी हो जाने पर जीव को फिर कर्मानुसार शरीर धारण करना पड़ता है, और वह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक उसकी मुक्ति नहीं हो जाती।
यहाँ अच्छे-अच्छे फलों वाले वृक्षों, मनोहर वाटिकाओं और अप्सराओं आदि का निवास माना जाता है।

प्राय: सभी धर्मों, देशों और जातियों में स्वर्ग और नरक की कल्पना की गयी है। ईसाइयों के विचारानुसार स्वर्ग ईश्वर का निवास स्थान है, और वहाँ फरिश्ते तथा धर्मात्मा लोग अनन्त सुख का भोग करते हैं।
मुसलमानों का स्वर्ग बिहिश्त कहलाता है। मुसलमान लोग भी बिहिश्त को खुदा और फरिश्तों के रहने की जगह मानते हैं, और कहते हैं कि दीनदार लोग मरने पर वहीं जायेंगे उनका विहिश्त इन्द्रिय सुख की सब प्रकार की सामग्री से परिपूर्ण कहा जाता है।
वहाँ दूध और शहद की नदियाँ तथा समुद्र हैं। अंगूरों के वृक्ष हैं, और कभी वृद्ध न होने वाली अप्सरायें हैं। यहूदियों के यहाँ तीन स्वर्ग की कल्पना की गयी है।”

स्वर्ग में देवताओं का निवास माना जाता है, हिन्दी शब्द सागर संख्या पृष्ठ 1620 में उनके विषय में यह लिखा गया है-

”वेदों में देवता शब्द से कई प्रकार के भाव लिए गये हैं। साधारणत: मंत्रो के जितने विषय हैं, वे सब देवता कहलाते हैं।
सिल, लोढ़े, मूसल, खली, नदी, पहाड़ इत्यादि से लेकर घोड़े, मेढ़क, मनुष्य (नारशंस) इन्द्र, आदित्य इत्यादि तक वेद मन्त्रों के देवता हैं।
कात्यायन ने अनुक्रमणिका में मंत्र के वाच्य विषय को देवता कहा है। निरुक्तकार यास्क ने देवता शब्द को दान, दीपन, और द्युस्थान गत होने से निकाला है। देवता के संबंधा में प्राचीनों के चार मत पाए जाते हैं, ऐतिहासिक, याज्ञिक, नैरुक्तिक, और आध्यात्मिक।
ऐतिहासिकों के मत से प्रत्येक मंत्र भिन्न घटनाओं या पदार्थों को लेकर बना है। याज्ञिक लोग मंत्र ही को देवता मानते हैं, जैसा कि जैमिनि ने मीमांसा में स्पष्ट किया है। मीमांसा दर्शन के अनुसार देवताओं का कोई रूप, विग्रह आदि नहीं, वे मंत्रत्मक हैं।
याज्ञिकों ने देवताओं को दो श्रेणियों में विभक्त किया है, सोमप और असोमप। अष्ट वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, प्रजापति और वषट्कार ये 33 सोमप देवता कहलाते हैं।
एकादश प्रदाजा, एकादश अनुयाजा, और एकादश उपयाजा ए असोमप देवता कहलाते हैं। सोमपायी देवता सोम से सन्तुष्ट हो जाते हैं, और असोमपायी पशु से तुष्ट होते हैं। नैरुक्तिक लोग स्थान के अनुसार देवता लेते हैं, और तीन देवता मानते हैं, अर्थात् पृथिवी का अग्नि, अन्तरिक्ष का इन्द्र वा वायु और द्यु स्थान का सूर्य।
बाकी देवता या तो इन्हीं तीनों के अन्तर्भूत हैं, अथवा होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता, आदि के कर्म भेद के लिए, इन्हीं तीनों के अलग-अलग नाम हैं, ऋग्वेद में कुछ ऐसे मन्त्र भी हैं, जिनमें भिन्न देवताओं में एक ही के अनेक नाम कहा है।
जैसे, बुध्दिमान लोग, इन्द्र, मित्र, और अग्नि को एक होने पर भी इन्हें बहुत बतलाते हैं।” (ऋग्वेद 1।164।46)।
यही मंत्र आध्यात्मिक पक्ष वा वेदान्त के मूल बीज हैं। उपनिषदों में इन्हीं के अनुसार एक ब्रह्म की भावना की गयी है।

प्रकृति के बीच जो वस्तुएँ प्रकाशमान, ध्यान देने योग्य और उपकारक देख पड़ीं, उनकी स्तुति या वर्णन ऋषियों ने मंत्रो द्वारा किया, जिन देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ आदि होते थे, उनकी कुछ विशेष स्थिति हुई, वे लोग धन, धन्य, युद्ध में जय, शत्रुओं का नाश आदि चाहते थे।
देवता शक्ति से ऐसी ही, अगोचर सत्ताओं का भाव समझा जाने लगा, धीरे-धीरे पौराणिक काल में रुचि के अनुसार और भी अनेक देवताओं, की कल्पना की गयी। ऋग्वेद में जिन देवताओं के नाम आये हैं, उनमें से कुछ ये हैं-

अग्नि, वायु, इन्द्र, मित्र, वरुण, अश्र्चिद्वय, विश्वेदेवा, मरुद्गण, ऋतुगण, ब्रह्मणस्पति, सोम, त्वष्टा, सूर्य, विष्णु, पृश्नि; यम, पर्जन्य, अर्यमा, पूषा, रुद्रगण, वसुगण, आदित्य गण, उशना, त्रित, चैतन, अज, अहिर्बुध्न, एकयाक्त, ऋभुक्षा,गरुत्मान् इत्यादि। कुछ देवियों के नाम आये हैं, जैसे सरस्वती, सुनृता, इला, इन्द्राणी, होत्र, पृथिवी, उषा, आत्री, रोदसी, राका, सिनीवाली, इत्यादि।

ऋग्वेद में मुख्य देवता 33 माने गये हैं, जो शत्पथ ब्राह्मण में इस प्रकार गिनाये गये हैं, 8 वसु 11 रुद्र 12 आदित्य तथा इन्द्र और प्रजापति। ऋग्वेद में एक स्थान पर देवताओं की संख्या 3339 कही गयी है।
3।9।9 शतपथ ब्राह्मण और सांख्यायन श्रौत सूत्र में भी यह संख्या दी हुई है। इस पर सायण कहते हैं, कि देवता 33 ही हैं, 3339 नाम महिमा प्रकाशक है।
देवता मनुष्यों से भिन्न अमर प्राणी माने जाते थे, इसका उल्लेख ऋग्वेद में स्पष्ट है। ”हे असुर वरुण! देवता हों या मर्त्य (मनुष्य) हों, तुम सब के राजा हो।” (ऋक् 2।27।10)।

पीछे पौराणिक काल में जिसका थोड़ा बहुत सूत्रपात शुक और सूत के समय में हो चुका था, वेद के 33 देवताओं से 33 कोटि-देवों की कल्पना की गयी। इन्द्र, विष्णु, रुद्र, प्रजापति इत्यादि वैदिक देवताओं के रूप रंग कुटुम्ब आदि की कल्पना की गयी।
द्युस्थान (आकाश) के वैदिक देवता विष्णु (जो 12 आदित्यों में थे) आगे चलकर चतुर्भुज, शंख चक्र गदा पद्म, लक्ष्मी के पति हो गये। वैदिक रुद्र जटी, त्रिशूलधारी, पर्वतों के पति, गणेश, और स्कंद के पिता हो गये।
वैदिक प्रजापति वेद के वक्ता चार मुख वाले ब्रह्मा हो गये। देवताओं की भावना और उपासना में यह भेद महाभारत समय से ही कुछ-कुछ पड़ने लगा। कृष्ण के समय तक वैदिक इन्द्र की पूजा होती थी, जो पीछे बन्द हो गयी, यद्यपि इन्द्र देवताओं के राजा और स्वर्ग के स्वामी बने रहे।
आजकल हिन्दुओं में उपासना के लिए, पाँच देवते मुख्य माने गये हैं, विष्णु, शिव, सूर्य, गणेश, और दुर्गा। ये पंच देव कहे जाते हैं।
यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, और पुराणों के अनुसार इन्द्र चंद आदि देवते, कश्यप से उत्पन्न हुए। पुराणों में लिखा है, कि कश्यप की दिति नाम की स्त्री से दैत्य, और अदिति नाम की स्त्री से देवता उत्पन्न हुए।

बौद्ध और जैन लोग भी देवताओं को मानते हैं, और इसी पौराणिक रूप में, भेद केवल इतना है कि वे देवताओं को बुद्ध, बोधिसत्तव, वा तीर्थंकरों से निम्न श्रेणी का मानते हैं। बौद्ध लोग भी देवताओं के कई गण या वर्ग मानते हैं।
चातुर, महारात्रिक, तुषिक आदि। जैन तीन चार प्रकार के देवता मानते हैं। वैमानिक या कल्पभव, कल्पातीत, ग्रैवेयक, और अनुत्तर। वैमानिक बारह हैं। सौधर्म, ईशान, सनत्कुमार, महेन्द्र, ब्रह्मा, अंतक शुक्र, सह्स्त्रर, नत, प्राणत, आरण, और अच्युत।